
Khelo India Winter Games 2026: गुलमर्ग की फरवरी वाली सुबहों में एक अजीब सी खामोशी होती है, जिसे सिर्फ ऊपर जाती गोंडोला की घरघराहट या देवदार के पेड़ों से गिरती ताजी बर्फ की आवाज ही तोड़ती है। लेकिन इस खामोशी के पीछे एक जबरदस्त तपस्या चल रही है। पीर पंजाल की पहाड़ियों पर जब सूरज की पहली किरण पड़ती है, तो वहां भारत के कोने-कोने से आए युवा एथलीट अपनी किस्मत को तराश रहे होते हैं। 23 से 26 फरवरी तक होने वाले ‘खेलो इंडिया विंटर गेम्स 2026’ के छठे संस्करण के लिए गुलमर्ग अब सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि उन सपनों का ‘लॉन्च पैड’ बन गया है, जिन्हें कल तक हमारे देश में ‘असंभव’ माना जाता था।
केरल से कश्मीर तक: जब भूगोल की सीमाएं मिट गईं
इन खेलों की सबसे खूबसूरत तस्वीर तब दिखती है जब भूगोल की सीमाएं इस सफेद चादर पर आकर मिट जाती हैं। जरा सोचिए, केरल से आया मोहम्मद सिनान, जिसने बचपन में कभी बर्फ को छुआ तक नहीं था, आज उसी बर्फ पर अपनी रफ्तार से इतिहास लिखने को बेताब है। सिनान जब कहता है कि यहां आकर उसे किसी बड़े मिशन का हिस्सा होने का एहसास होता है, तो समझ आता है कि खेलो इंडिया ने कैसे सुदूर दक्षिण को बर्फीले उत्तर से जोड़ दिया है। वहीं हैदराबाद के यशवंत रेड्डी, जो कल तक आसमान से छलांग लगाने वाले स्काईडाइवर थे, आज ढलानों पर स्कीइंग सीख रहे हैं। वे मजाक में कहते हैं कि विमान से कूदना आसान है, लेकिन यहाँ इस ढलान और गुरुत्वाकर्षण का सम्मान करना पड़ता है। यह विविधता ही इन खेलों की असली जान है।
सांसों की परीक्षा और हाड़ कंपाती चुनौतियां
तैयारी की डगर यहाँ आसान नहीं है। समुद्र तल से लगभग 8700 फीट की ऊंचाई पर शरीर से ज्यादा दिमाग की परीक्षा होती है। पुणे के ऋषि गुलाने बड़ी बेबाकी से बताते हैं कि शुरुआती दो दिनों में ऊंचाई की वजह से सीना जकड़ने लगता है और सांस लेना दूभर हो जाता है, लेकिन एक बार जब आप इस माहौल में ढल जाते हैं, तो यही चुनौतियां आपकी एकाग्रता को और तेज कर देती हैं। इंदौर के अतुल वैद के लिए गुलमर्ग किसी यूरोपीय ‘एल्प्स’ से कम नहीं है। वे जानते हैं कि यहाँ की मिट्टी और बदलती बर्फ पर एक सेकंड की लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। इन खिलाड़ियों के लिए हर मोड़, हर टर्न सिर्फ सेकंड्स का खेल नहीं, बल्कि सालों की मेहनत का निचोड़ है।
अदृश्य होने के डर से पहचान मिलने तक का सफर
इन वादियों में जम्मू-कश्मीर के खिलाड़ियों के लिए यह लड़ाई थोड़ी ज्यादा निजी और भावनात्मक है। स्थानीय एथलीट कनिका शान जब अपनी स्कीइंग की फुटेज फोन पर बार-बार देखती हैं, तो उनकी आंखों में एक अलग चमक होती है। वे याद करती हैं कि खेलो इंडिया से पहले वे खुद को ‘अदृश्य’ महसूस करती थीं, जैसे कोई उन्हें जानता ही न हो, लेकिन आज वे अपनी पहचान के साथ कोर्ट पर खड़ी हैं। उनके लिए घर के आंगन में जीतना एक अलग ही गर्व की बात है। वहीं जम्मू के अंकुश बलाज़ा जब स्लैलम गेट्स के बीच से पाउडर जैसी बर्फ उड़ाते हुए निकलते हैं, तो वे सिर्फ अपनी मांसपेशियों को नहीं, बल्कि अपने धैर्य और अपनी नसों को भी ट्रेन कर रहे होते हैं।
मेडल की रेस से बड़ा है ये ‘ड्रीम स्टेज’
जैसे-जैसे 23 फरवरी करीब आ रही है, गुलमर्ग का मंजर बदलने लगा है। देवदार की कतारों के बीच अब झंडे लहराने लगे हैं और टाइमर्स की गूंज सुनाई देने लगी है। चार दिनों तक चलने वाली इस जंग में स्की माउंटेनियरिंग से लेकर स्नोबोर्डिंग तक के पदक दांव पर होंगे, और भारतीय सेना अपनी चैंपियनशिप बचाने के लिए जान लगा देगी। लेकिन मेडल की इस रेस से परे, गुलमर्ग ने भारत को एक नया आत्मविश्वास दिया है। यहाँ कोई केरल से है, कोई मध्य प्रदेश से तो कोई हरियाणा से, लेकिन जब वे स्टार्ट गेट पर खड़े होते हैं, तो वे सिर्फ भारतीय होते हैं। यह ‘ड्रीम स्टेज’ गवाह है कि अब भारत का विंटर स्पोर्ट्स का भविष्य किसी के रोके नहीं रुकने वाला।



