गोवा के सोमेश्वर महादेव… कुर्डी गांव की वो कहानी जिसे ‘सलाउलिम बांध’ के पानी ने निगल लिया!

कुर्डी का सोमेश्वर मंदिर हमें सिखाता है कि भले ही नक्शे से बस्तियां मिट जाएं, लेकिन संस्कृति और श्रद्धा को डुबोया नहीं जा सकता. लेकिन सवाल यह है कि क्या बार-बार जलमग्न होने और फिर सूखने की यह प्रक्रिया इन प्राचीन पत्थरों को कब तक सुरक्षित रख पाएगी? क्या भविष्य की पीढ़ियां इस अदृश्य विरासत को देख पाएंगी?

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गोवा का नाम सुनते ही हमारे मन में सुनहरे समुद्र तट और पुर्तगाली वास्तुकला की तस्वीर उभरती है. लेकिन दक्षिण गोवा के संगेम (Sanguem) तालुका में पश्चिमी घाट की गोद में एक ऐसा रहस्य छिपा है, जो साल में केवल एक महीने के लिए दुनिया के सामने आता है. यह कहानी है कुर्डी (Curdi) गांव की, जिसे गोवा का अटलांटिस कहा जाता है.

विकास की वेदी पर दी गई एक बड़ी ‘बलि’

कुर्डी कभी गोवा का सबसे समृद्ध और उपजाऊ कृषि क्षेत्र था, जिसे पूरे इलाके का अन्न भंडार कहा जाता था. 1960 के दशक में गोवा के प्रथम मुख्यमंत्री दयानंद बंदोदकर ने दक्षिण गोवा को पानी की कमी से न जुझना पड़े ये सोचकर सलाउलिम बांध (Salaulim Dam) का सपना देखा. इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए कुर्डी के लगभग 684 परिवारों ने अपने घर, खेत और पुरखों की यादों की कुर्बानी दी. 1986 में जब बांध के गेट बंद हुए, तो देखते ही देखते पूरी सभ्यता जलमग्न हो गई.

सोमेश्वर महादेव: जब महादेव ने अपनी जगह नहीं छोड़ी

गांव के डूबने के समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक ऐतिहासिक कार्य किया. पास ही स्थित 10वीं शताब्दी के महादेव मंदिर को पत्थर-दर-पत्थर उखाड़कर 17 किमी दूर सुरक्षित रूप से फिर से स्थापित किया गया. हालांकि, श्री सोमेश्वर महादेव मंदिर आज भी अपनी मूल जगह पर अडिग खड़ा है. स्थानीय लोगों की अटूट आस्था थी कि मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है और इसे हटाना अशुभ होगा. आज यही मंदिर आधुनिक विकास और मानवीय त्याग का मूक गवाह बना हुआ है. 10वीं-11वीं शताब्दी की कदंब वास्तुकला से बना यह मंदिर इतना मजबूत है कि दशकों तक पानी के नीचे रहने के बाद भी इसका ढांचा सुरक्षित है.

मई का ‘भावनात्मक महाकुंभ’

जब मई की चिलचिलाती धूप सलाउलिम जलाशय का जलस्तर कम करती है, तब कुर्डी गांव पानी से बाहर निकल आता है. यह सिर्फ एक भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि एक भावनात्मक मिलन है. यहां हिंदू सोमेश्वर महादेव की पूजा करते हैं, ईसाई समुदाय चैपल में प्रार्थना करता है और मुस्लिम दरगाह पर दुआ मांगते हैं. यह गांव संगीत की महान हस्तियों, मोगुबाई कुर्डीकर और किशोरी अमोनकर की जन्मभूमि है. उत्सव के दौरान यहां गूंजता शास्त्रीय संगीत कुर्डी की यादों को फिर से जीवित कर देता है. कुर्डी का सोमेश्वर मंदिर हमें सिखाता है कि भले ही नक्शे से बस्तियां मिट जाएं, लेकिन संस्कृति और श्रद्धा को डुबोया नहीं जा सकता. लेकिन सवाल यह है कि क्या बार-बार जलमग्न होने और फिर सूखने की यह प्रक्रिया इन प्राचीन पत्थरों को कब तक सुरक्षित रख पाएगी? क्या भविष्य की पीढ़ियां इस अदृश्य विरासत को देख पाएंगी?

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