जमे हुए तालाबों से ओलिंपिक के सपनों तक: लद्दाख की ‘सितारा’ Skarma Tsultim की प्रेरक दास्तां

0
93
स्कर्मा सुल्टिम: लेह के जमे हुए तालाबों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक, लद्दाख की 'गोल्डन गर्ल' की अनकही कहानी
स्कर्मा सुल्टिम: लेह के जमे हुए तालाबों से अंतरराष्ट्रीय मंच तक, लद्दाख की 'गोल्डन गर्ल' की अनकही कहानी

लेह (लद्दाख): लद्दाख की स्थानीय भाषा में ‘स्कर्मा’ का अर्थ होता है—सितारा। और आज 2026 के खेलो इंडिया शीतकालीन खेलों के बीच, यह सितारा लेह की बर्फीली सतह पर अपनी चमक बिखेर रहा है। यह कहानी है स्कर्मा सुल्टिम (Skarma Tsultim) की, जो लद्दाख की पहली अंतरराष्ट्रीय स्पीड स्केटर हैं। लेकिन उनकी यह उड़ान किसी बड़े सपने से नहीं, बल्कि 2018 में पहनी गई स्केट्स की एक साधारण जोड़ी से शुरू हुई थी।

कुदरत की गोद में मिला टैलेंट

स्कर्मा का सफर लेह के गुपुख तालाबों से शुरू हुआ, जहाँ सर्दियों में स्कूल बंद होने पर बच्चे मजे के लिए स्केटिंग करते हैं। उस समय स्कर्मा के लिए यह सिर्फ एक खेल था। लेकिन कोच अब्बास नोर्डक की पारखी नजरों ने इस भीड़ में एक चैंपियन को पहचान लिया। कोच अब्बास, जिन्होंने बिना किसी फीस के लद्दाख के दर्जनों बच्चों को तराशा है, स्कर्मा के लिए गुरु से कहीं बढ़कर मार्गदर्शक बने।

खेलो इंडिया: वो मोड़ जिसने जिंदगी बदल दी

स्कर्मा बताती हैं कि उनका पहला नेशनल अनुभव काफी डरावना था। “आर्टिफिशियल बर्फ पर पहली बार स्केटिंग करना और पेशेवर खिलाड़ियों को देखना मुझे बेचैन कर रहा था,” वह याद करती हैं। लेकिन 2023 में गुलमर्ग में हुए तीसरे खेलो इंडिया शीतकालीन खेल ने सब कुछ बदल दिया। वहां स्कर्मा ने 1000 मीटर शॉर्ट ट्रैक में सिल्वर मेडल जीता। यह सिर्फ एक पदक नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय टीम के लिए उनका टिकट था। इसके बाद उन्होंने सिंगापुर और फिलीपींस में भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरुआती प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, लेकिन ‘खेलो इंडिया’ ने उन्हें वह आत्मविश्वास दिया कि वह भी दुनिया के बेहतरीन एथलीटों से टकरा सकती हैं।

जब गांव ने हारने पर भी दिया ‘विजेता’ सा सम्मान

एक समय ऐसा भी आया जब स्कर्मा का मन टूटने लगा था। पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा था। लेकिन जब वह विदेश से वापस लौटीं, तो लेह एयरपोर्ट पर जो हुआ उसने उनका जीवन बदल दिया। उनके परिवार, गांव के मुखिया (गोबा) और थिकसे मठ के प्रमुख चेंबरलेन उनका स्वागत करने पहुंचे थे।

स्कर्मा कहती हैं, “वे मुझे मेडल के लिए नहीं, बल्कि भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए सम्मान देने आए थे। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मेरा समुदाय मेरे साथ खड़ा है, और मैंने तय किया कि मैं अब पीछे नहीं मुडूंगी।”

सफलता का सिलसिला और 2026 का लक्ष्य

चौथे खेलो इंडिया खेलों में स्कर्मा ने गोल्ड जीतकर लद्दाख को पहली बार पदक तालिका में शीर्ष पर पहुंचाने में मदद की। पांचवें संस्करण में उन्होंने अपना पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता। अब, छठे खेलो इंडिया शीतकालीन खेल 2026 में स्कर्मा 500 मीटर और 1000 मीटर शॉर्ट ट्रैक स्पर्धाओं में दावेदारी पेश कर रही हैं।

कोच अब्बास: एक निस्वार्थ समर्पण

स्कर्मा की सफलता का श्रेय उनके कोच अब्बास नोर्डक को जाता है। “सर हमसे ज्यादा मेहनत करते थे। कई बार उन्होंने हमारे खर्चों के लिए अपनी जेब से पैसे दिए,” स्कर्मा भावुक होकर कहती हैं। आर्थिक तंगी और अंतरराष्ट्रीय लीगों तक पहुंच की कमी के बावजूद, खेलो इंडिया जैसे प्लेटफार्म ने स्कर्मा को वो पहचान दी है जिसकी वह हकदार थीं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here