पाम संडे: यरूशलेम की वो ‘विजयी यात्रा’, जिसकी मंजिल शहादत की सूली थी!

यरूशलेम की गलियों से गोवा के चर्चों तक... आस्था, सस्पेंस और शांति के उस पवित्र सप्ताह की शुरुआत, जिसने दुनिया का इतिहास बदल दिया.

0
63
PALM SUNDAY

पणजी: इतिहास गवाह है कि जब भी कोई राजा युद्ध जीतकर लौटता है, तो वह ऊंचे अरबी घोड़ों या सोने के रथों पर सवार होता है. शान-ओ-शौकत और सेना का प्रदर्शन उसकी शक्ति की पहचान होती है. लेकिन आज से करीब 2,000 साल पहले, यरूशलेम की पथरीली गलियों ने एक ऐसा मंजर देखा जिसने सत्ता और विजय की परिभाषा ही बदल दी.एक ‘राजा’ आ रहा था, जिसके पास न सेना थी, न ताज और न ही कोई सुसज्जित रथ. वह सवार था एक मामूली गधे के बच्चे पर. हज़ारों की भीड़ उसके रास्ते में खजूर की टहनियाँ बिछा रही थी और एक सुर में चिल्ला रही थी— ‘होसन्ना!’ यानी हमें बचाइए. आज दुनिया इसी दिन को ‘पाम संडे’ के रूप में मना रही है.

गधे और खजूर का रहस्य: युद्ध नहीं, शांति का संदेश

पाम संडे सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि प्रतीकों का गहरा महासागर है. बाइबिल के अनुसार, यीशु ने जानबूझकर गधे को चुना. प्राचीन काल में घोड़ा युद्ध का जबकि गधा शांति का प्रतीक था. गधे पर सवार होकर उन्होंने संदेश दिया कि वे हथियारों के नहीं, बल्कि दिलों को जीतने वाले शांति के राजकुमार हैं. वहीं, खजूर की टहनियां यहूदियों के लिए जीत और आनंद का प्रतीक थीं. लेकिन इस कहानी में एक गहरा सस्पेंस और विरोधाभास भी है. जो भीड़ रविवार को खजूर की टहनियां बिछाकर उन्हें अपना मसीहा मान रही थी, ठीक पांच दिन बाद वही भीड़ उन्हें सूली पर चढ़ाने की मांग करने वाली थी. यही कारण है कि पाम संडे को ईसाई कैलेंडर का सबसे भावुक दिन माना जाता है, क्योंकि यहां से पवित्र सप्ताह शुरू होता है, जहां जीत और हार के बीच की लकीर बहुत धुंधली हो जाती है.

गोवा का रंग: ‘रामंचो ऐतार’ और ‘खुरिस’ की कला

पूरी दुनिया में पाम संडे की गूंज है, लेकिन गोवा का अंदाज़ निराला है. यहां इसे कोंकणी में रामंचो ऐतार (Ramancho Aitar) कहा जाता है. गोवा के इस पर्व की सबसे बड़ी पहचान है खुरिस. यह खजूर की कोमल पत्तियों को आपस में बुनकर बनाया गया एक छोटा क्रॉस होता है. गोवा के हर घर के दरवाजों पर ये बुनी हुई पत्तियां साल भर लगी रहती हैं. मान्यता है कि ये घर को बुरी शक्तियों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाती हैं. दिलचस्प बात यह है कि इन पत्तियों को फेंका नहीं जाता; अगले साल इन्हें जलाकर इनकी राख बनाई जाती है, जिसका इस्तेमाल ऐश वेडनेसडे पर किया जाता है.

पणजी से गोवा वेल्हा तक: जीवंत परंपराएं

राजधानी पणजी के मशहूर चर्च की सफेद सीढ़ियों पर आज क्रूज़ आस कोस्तस का भव्य जुलूस निकलता है. यहां यीशु की आदमकद प्रतिमा को कंधे पर उठाकर घुमाया जाता है. इस दौरान वेरोनिका बनी एक छोटी लड़की जब कोंकणी में दर्दभरा विलाप गीत गाती है, तो वहां मौजूद हज़ारों लोगों की आंखें नम हो जाती हैं. वहीं, गोवा वेल्हा में होने वाला संतों का जुलूस दुनिया भर में मशहूर है. रोम के बाद गोवा ही वह इकलौती जगह है जहां 31 से ज़्यादा संतों की आदमकद मूर्तियों को एक साथ जुलूस में निकाला जाता है. यहां आस्था की ऐसी मिसाल दिखती है कि हर धर्म के लोग इन मूर्तियों की पालकी के नीचे से रेंगकर निकलते हैं, जिसे आशीर्वाद का सर्वोच्च रूप माना जाता है.

विनम्रता की असली जीत

पाम संडे हमें याद दिलाता है कि तालियों की गूंज और फूलों का स्वागत स्थायी नहीं होता. यह दिन हमें विनम्रता की ताकत सिखाता है. ईसाई समुदाय के लिए अब अगले सात दिन आत्म-मंथन और प्रार्थना के हैं, जो गुड फ्राइडे की शहादत से होते हुए ईस्टर की महान जीत तक पहुंचेंगे.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here