मनसा देवी मंदिर: देवभूमि का वो दिव्य द्वार जहां जाग उठती है सोई किस्मत, जानिए कैलाश से लेकर बिल्व पर्वत तक का रहस्य!

बिल्व पर्वत पर विराजमान मां मनसा देवी का रहस्यमयी इतिहास. जानिए शिव जी के मानस से प्रादुर्भाव, पार्वती जी का कोप, नागवंश की रक्षा और ऋषिकुल से उनके गहरे जुड़ाव की कथा.

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हरिद्वार में केवल पतित-पाविनी गंगा ही प्रवाहित नहीं होतीं, बल्कि इस दिव्य नगरी की सुरक्षा के लिए शिवालिक की पहाड़ियों पर ब्रह्मांड के आरंभ काल की अलौकिक शक्तियां पहरा देती हैं. बिल्व पर्वत पर फहराती लाल ध्वजा मां मनसा देवी के उस धाम की प्रतीक है, जहां मन्नत का एक धागा इंसान के भाग्य के सारे ताले खोल देता है.

हरिद्वार और बिल्व पर्वत की लाल ध्वजा

देवभूमि उत्तराखंड का प्रवेश द्वार हरिद्वार सनातन आस्था का वो पावन केंद्र है जहां कदम रखते ही प्राणी के जन्मों-जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. यही वह पुण्य स्थान है जहां मां गंगा पर्वतों के सीने को चीरकर पहली बार मैदानी भाग में अपने चरण रखती हैं. परंतु क्या आप जानते हैं कि इस दिव्य नगरी की रक्षा का भार केवल गंगा जल पर नहीं, बल्कि आसपास के पर्वतों पर विराजमान अनादि शक्तियों पर भी है? अगर आप कभी हरिद्वार गए हैं, तो हर की पौड़ी से ठीक ऊपर, आसमान को छूते हुए शिवालिक पर्वत श्रृंखला के बिल्व पर्वत की ओर आपकी दृष्टि अवश्य गई होगी. उसी ऊंचे पर्वत पर लहराती लाल ध्वजा मां मनसा देवी के दिव्य धाम का संकेत देती है. हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु यहां सिर्फ एक धागा बांधने आते हैं और अपनी सोई हुई किस्मत जगाकर लौटते हैं, लेकिन यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं है. इसके पीछे पुराणों का वो गहरा रहस्य छुपा है जो भगवान शिव के मन, माता पार्वती के भयंकर क्रोध, नागराज वासुकी के आंचल और प्राचीन ऋषियों की तपस्या से जुड़ा हुआ है.

शिव का दिव्य तेज और प्रादुर्भाव

सृष्टि के शुरुआती दौर में मां मनसा देवी का जन्म सामान्य मानव रूप में किसी मां के गर्भ से नहीं हुआ. इसी कारण पुराणों में उन्हें अयोनिजा या अयोनिसंभवा कहा गया है. पूर्वी भारत के प्रसिद्ध ग्रंथ मनसा विजय और देवी भागवत पुराण के अनुसार, एक बार देवाधिदेव महादेव गहन समाधि में लीन थे. समाधि काल में शिव जी के भीतर ब्रह्मांडीय ऊर्जा का ऐसा अति तीव्र संचार हुआ कि उनका एक दिव्य तेज स्खलित होकर पाताल लोक के राजा, सर्पराज वासुकी की माता के पास पहुंच गया. नागमाता ने जब इस अलौकिक तेज को देखा, तो अपनी योगशक्ति से उसे सुरक्षित रखने के लिए एक अत्यंत सुंदर कन्या की प्रतिमा का निर्माण किया. जैसे ही शिव जी का वो दिव्य तेज उस प्रतिमा से स्पर्श हुआ, वह माटी की मूरत जीवंत हो उठी. साक्षात महादेव के तेज से दमकती एक कन्या प्रकट हुई. चूंकि इनका प्रादुर्भाव भगवान शिव के मानस (मन के संकल्प और वीर्य के अंश) से हुआ था, इसलिए देवताओं ने इनका नाम मनसा रखा. समाधि टूटने पर महादेव ने इस गुणवान पुत्री को सहर्ष स्वीकार कर पिता का अगाध प्रेम दिया और उन्हें ब्रह्मांड के सभी विषों व विषैले जीवों पर पूर्ण अधिकार का वरदान प्रदान किया.

कैलाश पर भ्रम और आदिशक्ति चंडी का प्रकोप

पिता शिव अपनी तेजस्वी पुत्री को लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे. वे चाहते थे कि मनसा कैलाश पर माता पार्वती, प्रथम पूज्य गणेश और स्वामी कार्तिकेय के साथ रहें. परंतु शिव जी ने माता पार्वती को मनसा के जन्म की पूरी पृष्ठभूमि पूर्व में नहीं बताई थी. जब आदिशक्ति पार्वती ने महादेव के साथ एक परम सुंदरी, नवयौवना कन्या को कैलाश में प्रवेश करते देखा, तो उनके मन में गहरा भ्रम उत्पन्न हो गया. उन्हें लगा कि महादेव उनके साथ छल करके किसी अन्य स्त्री को ले आए हैं. शिव जी के बार-बार समझाने पर भी पार्वती जी का संशय शांत नहीं हुआ. क्रोध की सीमा पार होने पर उन्होंने चंडी का रौद्र रूप धारण कर लिया. आदिशक्ति के क्रोधाग्नि से मां मनसा की एक आंख झुलस गई… परंतु आत्मसम्मान के लिए उन्होंने कैलाश त्यागकर पाताल और ऋषियों की शरण चुनी. चंडी के दिव्य नेत्रों से निकले क्रोध के तेज से मां मनसा की एक आंख झुलस गई और वे एक आंख से दृष्टिहीन हो गईं. हालांकि सत्य का ज्ञान होने पर माता पार्वती को अत्यंत पश्चाताप हुआ, परंतु मां मनसा का कोमल हृदय छलनी हो चुका था. स्वाभिमान की रक्षा हेतु उन्होंने कैलाश छोड़ने का निर्णय लिया. इसके बाद भगवान शिव के निर्देश पर नागराज वासुकी ने उन्हें पाताल लोक में बहन की भांति सम्मानीय स्थान दिया, जिससे वे नागमाता और विषहरी कहलाईं.

ऋषिकुल से जुड़ाव और जन्मेजय का सर्प सत्र यज्ञ

ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं महाभारत के अनुसार, मां मनसा देवी का प्रादुर्भाव महर्षि कश्यप के मानस संकल्प से भी माना गया है. असुरों और नागों के प्रकोप को शांत करने हेतु महर्षि कश्यप ने उन्हें प्रकट कर वेदों का गूढ़ ज्ञान दिया और मंत्रों की अधिष्ठात्री बनाया. यही कारण है कि हरिद्वार का यह क्षेत्र प्राचीन काल से ऋषियों की तपोभूमि और ऋषि मंदिर परिसर के रूप में जाना जाता है. मां मनसा का विवाह परम तपस्वी महर्षि जरत्कारु के साथ हुआ. उनसे एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिनका नाम आस्तीक मुनि पड़ा. जब राजा जन्मेजय ने अपने पिता परीक्षित की नागदंश से हुई मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए भयंकर सर्प सत्र यज्ञ शुरू किया जिसमें विश्व के समस्त सर्प खिंचे चले आ रहे थे और भस्म हो रहे थे तब मां मनसा के निर्देश पर आस्तीक मुनि ने अपनी बुद्धिमत्ता से राजा जन्मेजय को संतुष्ट कर उस यज्ञ को रुकवाया. इस प्रकार ऋषिकुल की इस दिव्य शक्ति ने समस्त नाग वंश को विलुप्त होने से बचाया था.

समुद्र मंथन का हलाहल और ‘विषहरी’ नाम

समुद्र मंथन के समय जब संपूर्ण ब्रह्मांड को जलाने वाला कालकूट (हलाहल) विष निकला, तो सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया. विष की तीक्ष्णता से महादेव का शरीर तपने लगा और वे अचेत होने लगे. उस संकट काल में मां मनसा ने अपनी विष-हरण शक्ति से महादेव के शरीर से विष के प्रभाव को सोख लिया और उनके प्राणों की रक्षा की. इसी उपकार के पश्चात वे तीन लोकों में विषहरी नाम से पूजित हुईं.

कालसर्प दोष से मुक्ति

आज के दौर में ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत मां मनसा देवी की साधना अत्यंत प्रभावकारी मानी गई है. कुंडली में जब समस्त ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाते हैं, तब जीवन में कड़े संघर्ष, व्यापारिक हानि और मानसिक तनाव पैदा होता है. नागराज वासुकी की बहन व नागों की अधिष्ठात्री होने के कारण मां मनसा के दरबार में सर्प सूक्त का पाठ करने से राहु-केतु का दुष्प्रभाव तत्काल शांत होता है. जिन्हें स्वप्न में सांप दिखाई देते हैं या अज्ञात विषैले जीवों का भय रहता है, उन्हें मां विषहरी के स्मरण मात्र से अभयदान प्राप्त होता है.

मन्नत का धागा और अटूट जन-आस्था

हरिद्वार के बिल्व पर्वत पर स्थित मां मनसा देवी के सिद्धपीठ में परिसर के पवित्र वृक्ष पर लाल धागा बांधने की प्राचीन परंपरा है. यह धागा इस बात का प्रतीक है कि भक्त अपनी मनसा (मनोकामना) मां के चरणों में समर्पित कर रहा है. मान्यता है कि मन्नत पूरी होने के पश्चात श्रद्धालुओं को पुनः आकर उस धागे को खोलना होता है. माता पार्वती का श्राप सहने के बाद भी मां मनसा के हृदय में संसार के प्रति दया में कोई कमी नहीं आई. जो स्वयं दुखों की अग्नि से गुजरता है, वही दूसरों के कष्टों को सबसे गहराई से समझ सकता है. यदि आप भी जीवन में मानसिक तनाव, दुर्भाग्य के विष या किसी अज्ञात भय से जूझ रहे हैं, तो हरिद्वार जाकर बिल्व पर्वत पर विराजमान मां मनसा देवी के दर्शन अवश्य करें.

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