गोवा का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के जेहन में समुद्र तट और पार्टियां आती हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि गोवा की इन खूबसूरत पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक ऐसी कहानी दबी है, जिसने हजारों सालों से यहां के समाज को एक सूत्र में पिरोया हुआ है? यह कहानी है सात दिव्य बहनों और उनके एकमात्र भाई खेतोबा की. एक ऐसी पौराणिक गाथा, जहां एक छोटी सी भूल ने रिश्तों की दिशा बदल दी और फिर शुरू हुआ सदियों लंबा पश्चाताप का सिलसिला.
काशी से गोवा तक का दिव्य सफर
गोवा की लोककथाओं के अनुसार, ये सात बहनें और उनका भाई मूल रूप से गोवा के नहीं थे. वे उत्तर भारत की पवित्र नगरी काशी से एक विशाल सफेद हाथी पर सवार होकर गोवा पहुंचे थे. इनका पहला पड़ाव बना डिचोली तालुका का मये गांव. आज भी यहां की मिट्टी में उनकी मौजूदगी महसूस की जाती है.
वह घटना जिसने भाई की कमर टेढ़ी कर दी
लोककथा के अनुसार, सबसे बड़ी बहन महामाया ने अपने छोटे भाई खेतोबा को अग्नि लाने के लिए पास के बाजार भेजा. खेतोबा स्वभाव से चंचल थे, वे बाजार तो गए, लेकिन वहां बच्चों को खेलता देख अपनी जिम्मेदारी भूलकर उनके साथ खेलने लगे. काफी देर तक जब खेतोबा वापस नहीं लौटे, तो बहन लैराई उन्हें ढूंढने निकलीं. लैराई अपने क्रोधी स्वभाव के लिए जानी जाती थीं. जब उन्होंने देखा कि भाई कर्तव्य छोड़कर खेल रहा है, तो उन्होंने गुस्से में खेतोबा को इतनी जोर से लात मारी कि उनकी कमर हमेशा के लिए झुक गई. अपमानित और आहत होकर खेतोबा वैंगिणी गांव चले गए. आज भी वैंगिणी के प्राचीन मंदिर में खेतोबा की झुकी हुई मूर्ति इस ऐतिहासिक घटना की गवाही देती है.
अग्नि साधना: पश्चाताप का अनोखा तरीका
जब लैराई का क्रोध शांत हुआ, तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ. अपने भाई के प्रति किए गए व्यवहार का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने अग्नि पर चलने का व्रत लिया. वहीं, दूसरी बहन केलबई ने अपराध बोध में अपने सिर पर अग्नि धारण कर चलने का संकल्प लिया. यही पौराणिक पश्चाताप आज गोवा के विश्व प्रसिद्ध उत्सवों—शिरगांव की लैराई जत्रा और मुलगांव की केलबई जत्रा का मुख्य आधार है.
धार्मिक पहचान: सात बहनें और सप्तमातृका
धार्मिक विद्वानों का तर्क है कि ये सात बहनें वास्तव में हिंदू धर्म की सप्तमातृका परंपरा (ब्राह्मणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा) का स्थानीय संस्करण हैं.श्री लखमी (केलबई) इनके मंदिर में देवी को गजलक्ष्मी के रूप में दर्शाया गया है, जिनके दोनों ओर हाथी बने हुए हैं. यह समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है.
सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल: मिराबाई और मिलेग्रेस
इस गाथा का सबसे अद्भुत पहलू है मापुसा की मिराबाई. पुर्तगाली शासन के दौरान जब मंदिर की जगह गिरजाघर बना, तो मिराबाई की पहचान अवर लेडी ऑफ मिरेकल्स (Our Lady of Miracles) के रूप में हुई. शिरगांव की लैराई देवी के मंदिर से आज भी मिलेग्रेस चर्च के लिए तेल भेजा जाता है, जिससे वहां दीप जलते हैं. बदले में चर्च से देवी लैराई को मोगरे के फूलों की माला भेजी जाती है. यह परंपरा गोवा के साझा इतिहास और सांप्रदायिक सद्भाव की सबसे खूबसूरत तस्वीर पेश करती है.
कहां है इन भाई-बहनों का स्थान?
इस अलौकिक परिवार के सदस्य आज गोवा के इन अलग-अलग गांवों में विराजमान हैं:
- लैराई: शिरगांव (प्रसिद्ध अग्नि साधना स्थल)
- केलबई (लखमी मां): मुलगांव (समृद्धि की देवी)
- महामाया: मये गांव (गन्ने की टोकरी में निवास)
- मिराबाई: मापुसा (सांप्रदायिक एकता का प्रतीक)
- मोरजाई: मोरजी (समुद्र और मछुआरों की रक्षक)
- अजादीपा: अंजीदीव द्वीप
- शीतलाई: पाताल लोक (अदृश्य शक्ति)
- खेतोबा (भाई): वैंगिणी (झुकी कमर वाली प्राचीन मूर्ति)
गोवा की ये सात बहनें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये यहाँ के सामाजिक भाईचारे और गौरवशाली इतिहास की पहचान हैं.




