वंदे मातरम पर छिड़ गई छंद की लड़ाई, तुष्टिकरण की राजनीति या राष्ट्रभक्ति ?

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वंदे मातरम गायन को लेकर एक बार फिर सियासी संग्राम छिड़ गया है। इस बार कांग्रेस ने CWC से प्रस्ताव पास कर वंदे मातरम के सिर्फ दो छंद गाने का ही निर्णय लिया है। कांग्रेस का तर्क है 1937 में महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर समेत कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने जो फैसला लिया था। पार्टी आज उसी का पालन कर रही है।

जिसको लेकर गृह मंत्री अमित शाह भड़क गए। शाह ने इसे तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति करार दिया है। उनका आरोप है कि 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया था और अब कांग्रेस उसी पुराने फैसले को दोबारा लागू कर रही है।अमित शाह ने यह भी कहा कि 1937 के इस फैसले से दो-राष्ट्र सिद्धांत को मजबूती मिली और आगे चलकर देश के विभाजन की परिस्थितियां बनीं। शाह के मुताबिक, वंदे मातरम की रचना के 150वें वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार उस ऐतिहासिक गलती को सुधारने की कोशिश कर रही है और पूरे राष्ट्रगीत के गायन को बढ़ावा दे रही है।

ये विवाद वंदे मातरम गायन पर कानून बनने से सियासत के केंद्र में आया है। संसद ने हाल ही में इसे कानूनी संरक्षण देने वाला नया कानून पास किया है। इसके तहत वंदे मातरम को ‘जन गण मन’ के बराबर कानूनी संरक्षण मिला है। जानबूझकर इसके अपमान या गायन में रुकावट डालने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई को सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के गायन और बजाने को लेकर नए निर्देश जारी किए थे। इसमें दोनों के सही बोल, उच्चारण और तय प्रोटोकॉल का पालन करने को कहा गया था। निर्देशों के मुताबिक, अगर किसी कार्यक्रम में वंदे मातरम और जन गण मन दोनों गाए या बजाए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम और उसके बाद राष्ट्रगान होगा। अगर किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का अपना राज्य गीत भी है, तो पहले राज्य गीत फिर वंदे मातरम और अंत में जन गण मन रहेगा।

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