गोवा के शाश्वत कामत ने भारत का बढ़ाया मान…इंग्लैंड में Wolves Category-1 से नई पारी शुरू

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भारतीय फुटबॉल में लड़खड़ाया, लेकिन विश्व में नाम कमाया, इंग्लैंड में चमके गोवा के शाश्वत कामत
भारतीय फुटबॉल में लड़खड़ाया, लेकिन विश्व में नाम कमाया, इंग्लैंड में चमके गोवा के शाश्वत कामत

इस अवसर पर शाश्वत ने कहा कि “मेरे लिए यह व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैंने यह सुनिश्चित किया है कि अपने लक्ष्यों और सपनों को एक-एक कदम करके हासिल करूं। जब मैं 16 साल का था, तब मुझे अपने ड्रीम क्लब एफसी गोवा से जुड़ने का मौका मिला और वहीं से यह सपना शुरू हुआ। वहां के लोगों ने इसे संभव बनाया और मुझे अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने वहां बहुत कुछ सीखा और मुझे बेहद खुशी हुई।”

पणजी: ऐसे समय में जब भारतीय फुटबॉल मुश्किल दौर से गुजर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है, गोवा का एक युवा फुटबॉल की दुनिया की सबसे प्रतिस्पर्धी प्रणालियों में से एक में अपनी पहचान बना रहा है। गोवा से एफसी गोवा, फिर क्वींस पार्क रेंजर्स (QPR) और अब वॉल्वरहैम्प्टन वांडरर्स (Wolves) तक शाश्वत कामत का सफर महत्वाकांक्षा, मेहनत और उन संभावनाओं की कहानी है, जो तब सामने आती हैं जब युवा भारतीय अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक स्तर पर अवसर तलाशते हैं।

शाश्वत ने इंग्लैंड के क्लब वॉल्वर हैम्प्टन वांडरर्स (Wolves) की कैटेगरी-1 अकादमी में परफॉर्मेंस एनालिस्ट के तौर पर काम शुरू किया है। इंग्लैंड में कैटेगरी-1 अकादमी सर्वोच्च अकादमी वर्गीकरण है और इसे दुनिया में खिलाड़ियों के विकास के सबसे उच्च मानकों में से एक माना जाता है। गोवा के इस युवा के लिए यह उस सफर की बड़ी उपलब्धि है, जो महज 16 साल की उम्र में शुरू हुआ था।

इस अवसर पर शाश्वत ने कहा कि “मेरे लिए यह व्यक्तिगत रूप से बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैंने यह सुनिश्चित किया है कि अपने लक्ष्यों और सपनों को एक-एक कदम करके हासिल करूं। जब मैं 16 साल का था, तब मुझे अपने ड्रीम क्लब एफसी गोवा से जुड़ने का मौका मिला और वहीं से यह सपना शुरू हुआ। वहां के लोगों ने इसे संभव बनाया और मुझे अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने वहां बहुत कुछ सीखा और मुझे बेहद खुशी हुई।”

इसके बाद उनका सफर उन्हें इंग्लैंड ले गया, जहां QPR के साथ काम करने के दौरान उन्हें भारत से बिल्कुल अलग फुटबॉल विकास प्रणाली को करीब से समझने का मौका मिला। शाश्वत के मुताबिक, दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा अंतर युवा खिलाड़ियों के विकास के लिए अपनाई जाने वाली संरचना और उन पर दिए जाने वाले ध्यान में है।

उन्होंने कहा, “भारत में हम कहते हैं कि हम ग्रासरूट्स पर ध्यान देते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। QPR में आने के बाद मैंने देखा कि खिलाड़ियों का विकास कितनी सख्त परिस्थितियों में किया जाता है और उनकी प्रगति को रोजाना और साप्ताहिक आधार पर मॉनिटर किया जाता है।” यह निगरानी सिर्फ ट्रेनिंग मैदान तक सीमित नहीं रहती। खिलाड़ियों के साथ नियमित वन-टू-वन बैठकें होती हैं, जिसमें उनके विकास पर चर्चा की जाती है। इसके अलावा मनोवैज्ञानिकों के साथ भी उनकी बैठकें होती हैं, जो खिलाड़ियों के मानसिक व्यवहार और उनके मानसिक स्वास्थ्य को समझने में मदद करते हैं।

शाश्वत ने आगे कहा- “इन खिलाड़ियों का बहुत ज्यादा ख्याल रखा जाता है, जो ऐसी चीज है जो आपको भारत में देखने को नहीं मिलती।” उन्होंने कहा कि प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान और उनके विकास के लिए भारत को अपनी व्यवस्था में काफी सुधार करने की जरूरत है। दोनों देशों में काम करने के अनुभव के आधार पर शाश्वत इंग्लैंड के क्लबों में उपलब्ध संसाधनों और विशेषज्ञ विभागों को भी एक बड़ा अंतर मानते हैं। उन्होंने कहा कि दोनों की तुलना करें तो निश्चित रूप से यहां फुटबॉल इंडस्ट्री में भारत की तुलना में कहीं ज्यादा पैसा है। यहां खिलाड़ियों के प्रदर्शन, प्रतिभा की पहचान और विश्लेषण के लिए अलग-अलग विभाग हैं, जबकि भारत में एक ही व्यक्ति को कई बार यही सारे काम करने पड़ते हैं।”

उनका मानना है कि इंग्लैंड में कोचिंग सिस्टम की भी लगातार निगरानी होती है। कोचों को अपने पेशेवर ज्ञान को लगातार अपडेट करना पड़ता है और अपनी योग्यता बनाए रखने के लिए CPD यानी Continuous Professional Development जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

Wolves में क्या है शाश्वत की भूमिका?

Wolves में शाश्वत का काम सिर्फ मैच खत्म होने के बाद उसका विश्लेषण करना नहीं है। उनका सामान्य सप्ताह विपक्षी टीम का अध्ययन करने से शुरू होता है। इसके बाद वह विरोधी टीम की खेलने की शैली, उसकी ताकत और कमजोरियों पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते हैं। उन्होंने बताया, “आमतौर पर सप्ताह की शुरुआत में हम यह देखते हैं कि हमारा अगला मुकाबला किस टीम से है। हमारे पास एक विपक्षी रिपोर्ट होती है, जिससे हमें समझने में मदद मिलती है कि वह टीम किस तरह खेलती है और उसे हराने के लिए हम कौन-सी रणनीति अपना सकते हैं।” इसके बाद इस विश्लेषण को ट्रेनिंग में इस्तेमाल किया जाता है। टीम को जिन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत होती है, उसके आधार पर ट्रेनिंग सेशन तैयार किए जाते हैं। सेट पीसेज यानी फ्री-किक और कॉर्नर जैसी परिस्थितियों का भी विश्लेषण किया जाता है और तैयारी कराई जाती है। यह पूरी प्रक्रिया क्लब के गेम मॉडल के अनुरूप होती है। मैच के बाद भी काम खत्म नहीं होता। इसके बाद मैच का विस्तृत पोस्ट-मैच विश्लेषण किया जाता है, जिसमें यह देखा जाता है कि टीम ने क्या अच्छा किया, किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है और मैच के दौरान कौन से सकारात्मक पहलू सामने आए।

भारत में अवसरों की कमी

शाश्वत का मानना है कि भारत में ऐसे बहुत से युवा हैं जो परफॉर्मेंस एनालिस्ट जैसे क्षेत्रों में सफल हो सकते हैं, लेकिन उन्हें इस करियर के बारे में जानकारी और सही रास्ता उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा, “भारत में बहुत शानदार प्रतिभा और क्षमता है, जो विदेशों में बड़ा मुकाम हासिल कर सकती है। कुछ लोगों से मैंने खुद यह क्षेत्र सीखा। सोचिए अगर उन्हें विदेश जाकर वह करने का मौका मिलता जो मैं कर रहा हूं, तो वे निश्चित रूप से देश के झंडाबरदार बन सकते थे।” शाश्वत के मुताबिक, भारत में विशेष शैक्षणिक पाठ्यक्रमों की कमी सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से भारत में परफॉर्मेंस एनालिसिस और स्पोर्ट्स साइंस की पढ़ाई के लिए विशेष कोर्स नहीं हैं। भारत में परफॉर्मेंस एनालिसिस का क्षेत्र इतना अलग-थलग है कि ज्यादातर लोगों ने इसका नाम तक नहीं सुना या उन्हें पता ही नहीं है कि यह काम क्या होता है।” उन्होंने कहा कि यही चीज युवाओं को पीछे रोकती है।

फुटबॉल में करियर सिर्फ खिलाड़ी बनना नहीं

गोवा के उन युवाओं के लिए जो फुटबॉल की दुनिया में करियर बनाना चाहते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि पेशेवर खिलाड़ी बनें, शाश्वत का संदेश साफ है। “मैं कहूंगा कि बहुत सारे अवसर मौजूद हैं और आपको खुद पर भरोसा करके उन्हें हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। सपने जरूर पूरे हो सकते हैं, भले ही आप पेशेवर खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि पेशेवर एनालिस्ट या कोचिंग स्टाफ के सदस्य के रूप में आगे बढ़ें।” उनका कहना है कि खुद पर भरोसा रखना और अपनी क्षमता साबित करना जरूरी है। “आप हमेशा खुद को साबित कर सकते हैं और शीर्ष तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं, क्योंकि हम सभी के अंदर इसे सफल बनाने की क्षमता है।”

भारतीय फुटबॉल के संकट पर भी बोले शाश्वत

शाश्वत की यह उपलब्धि ऐसे समय आई है जब भारतीय फुटबॉल खुद एक कठिन दौर से गुजर रहा है। उन्होंने 2024 में भारत छोड़ा था। उनके मुताबिक, उस समय कई लोगों ने उन्हें विदेश जाने और वहां अवसर तलाशने की सलाह दी थी। उनका मानना है कि भारतीय फुटबॉल से जुड़े मौजूदा विवादों और समस्याओं ने युवा प्रतिभाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करने की जरूरत को और बढ़ा दिया है। उन्होंने कहा, “फुटबॉल में बड़ी गिरावट आई है। फेडरेशन में राजनीतिक दृष्टिकोण ने कई समस्याएं और विवाद पैदा किए हैं।” हालांकि, शाश्वत अपने विदेश जाने को भारतीय फुटबॉल से भागने के तौर पर नहीं देखते। उनके मुताबिक, यह दुनिया को यह दिखाने का मौका है कि अगर भारतीय प्रतिभाओं को सही मंच मिले तो वे क्या कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “इंग्लैंड में, जहां फुटबॉल की पूजा की जाती है, वहां मेरी भूमिका हासिल करना यह संदेश देता है कि लोगों को अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना चाहिए और वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा दिखानी चाहिए। यही वह चीज है जो उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए करनी चाहिए।”

गोवा के युवाओं के लिए प्रेरणा

शाश्वत के लिए गोवा का प्रतिनिधित्व करना भी गर्व की बात है। उन्होंने कहा, “अभी मैं अकेला गोअन हूं जो एक कैटेगरी-1 अकादमी में परफॉर्मेंस एनालिसिस के क्षेत्र में काम कर रहा हूं। यह दुनिया की अकादमियों के सबसे ऊंचे स्तर की रेटिंग है। इससे मुझे यह संदेश देने में मदद मिलती है कि हम जो चाहते हैं, उसे हासिल कर सकते हैं।” वह चाहते हैं कि उनकी कहानी गोवा के युवाओं को खेल के ऐसे क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए प्रेरित करे, जिनके बारे में उन्होंने शायद पहले कभी सोचा भी न हो। उन्होंने कहा, “यह उन युवाओं के अंदर एक चिंगारी पैदा कर सकता है, जो खेल के क्षेत्र में एक अलग तरह का करियर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।” शाश्वत का सफर उन लोगों से भी प्रभावित रहा है जिन्होंने उनका समर्थन किया और उन लोगों से भी जिन्होंने उन्हें रोकने या नीचे खींचने की कोशिश की। हालांकि, वह कहते हैं कि उन युवा छात्रों को देखकर उन्हें और ज्यादा प्रेरणा मिली, जो उनकी यात्रा से प्रभावित हुए और उसी तरह का करियर बनाने का सपना देखने लगे। उन्होंने कहा, “बहुत सारे युवा छात्र हैं जो मेरी और मेरी यात्रा को देखकर प्रेरित हुए हैं और खेल में इसी तरह का सफर तय करना चाहते हैं।” शाश्वत के लिए Wolves तक पहुंचना सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि फुटबॉल में करियर बनाने के कई रास्ते हैं और सफलता के लिए जरूरी नहीं कि कोई पेशेवर खिलाड़ी ही बने।

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