देहरादून: क्या आप भारत के एक ऐसे अनोखे मंदिर के बारे में जानते हैं, जिसे अदालत और कचहरी से भी ऊपर का दर्जा हासिल है? एक ऐसा दरबार, जहां न कोई वकील होता है, न गवाह, लेकिन न्याय की शत-प्रतिशत गारंटी मानी जाती है. उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के हनोल में स्थित महासू देवता मंदिर को स्थानीय लोग कलयुग का जीवित न्यायालय मानते हैं. इस मंदिर की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के राष्ट्रपति भवन से भी यहां हर साल एक खास भेंट भेजी जाती है.
राक्षसों का अंत करने प्रकट हुए थे चार दिव्य भाई
9वीं शताब्दी से जुड़े इस मंदिर का संबंध महाभारत काल से भी माना जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग के अंत और कलयुग की शुरुआत में इस पहाड़ी इलाके में किरमीर और कुरोदा नाम के राक्षसों का आतंक था. ग्रामीणों को उनसे मुक्ति दिलाने के लिए हुना भट्ट नामक ब्राह्मण ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की. महादेव के आशीर्वाद से कश्मीर की धरती से चार दिव्य भाई बोथा, बाशिक, पबासिक और चालदा महासू प्रकट हुए. चारों भाइयों ने राक्षसों का संहार कर घाटी को सुरक्षित किया. राक्षसों के वध के बाद चारों महासू भाइयों को इस क्षेत्र का रक्षक और राजा माना गया, जिनमें बोथा महासू का मुख्य मंदिर हनोल में स्थापित है.
अदालत के बजाय मंदिर में होता है न्याय
जमीन विवाद, चोरी या किसी अन्य अन्याय से पीड़ित लोग यहां किसी सरकारी अदालत में जाने के बजाय महासू देवता की शरण में आते हैं. मंदिर में लोटापानी नाम की एक विशेष परंपरा है, जिसमें देवता के नाम का पानी हाथ में लेकर शपथ ली जाती है. मान्यता है कि महासू देवता के समक्ष झूठ बोलने वाले को तुरंत दिव्य दंड भुगतना पड़ता है.
राष्ट्रपति भवन से नमक भेजने का रहस्य
देश की आजादी के बाद से ही एक अनोखी परंपरा चली आ रही है. भारत के राष्ट्रपति भवन से महासू देवता मंदिर के लिए हर साल भेंट के रूप में नमक भेजा जाता है. इसके पीछे विश्वास है कि ऐसा करने से पूरे देश में सुख, समृद्धि, शांति और न्याय व्यवस्था बनी रहती है.
भीम के पत्थर और काठ-कुनी स्थापत्य कला
मंदिर के आंगन में रखे भारी गोल पत्थरों के बारे में कहा जाता है कि इनका उपयोग महाभारत काल में महाबली भीम व्यायाम के लिए करते थे. इन्हें केवल शारीरिक शक्ति से उठाना नामुमकिन माना जाता है, लेकिन सच्चे मन और भक्ति भाव से प्रयास करने पर ये आसानी से उठ जाते हैं. मंदिर का निर्माण पारंपरिक काठ-कुनी (लकड़ी और पत्थर का जोड़) शैली में हुआ है. बिना सीमेंट और गारे के बनी यह ऐतिहासिक इमारत बड़े से बड़े भूकंप के झटकों को झेलने में सक्षम है.




