नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल करते हुए साफ कर दिया है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू नहीं की जा सकती. सरकार ने उन जनहित याचिकाओं का कड़ा विरोध किया है जिनमें SC-ST समुदाय के संपन्न लोगों को आरक्षण से बाहर करने की मांग की गई थी. केंद्र ने अदालत से इन याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध किया है. सरकार का कहना है कि याचिकाओं में किसी भी संवैधानिक या मौलिक अधिकार के हनन का मामला नहीं बनता. केंद्र ने स्पष्ट किया कि वर्तमान विधिक प्रावधानों में SC-ST श्रेणी पर क्रीमी लेयर लागू करने का कोई उल्लेख नहीं है, यह व्यवस्था केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) तक ही सीमित है.

याचिकाकर्ताओं का क्या तर्क था?
सर्वोच्च अदालत ने पिछले वर्ष अगस्त में इस विषय से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा था। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि, जो SC-ST परिवार पहले से उच्च संवैधानिक या सरकारी पदों का लाभ ले चुके हैं, उनकी अगली पीढ़ी को आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए. इससे आरक्षण का वास्तविक लाभ इस वर्ग के अंतिम और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति तक पहुंच सकेगा. आर्थिक रूप से पिछड़े SC-ST परिवारों के लिए एक अलग उप-श्रेणी बनाकर उन्हें नौकरियों और दाखिलों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

‘केवल संसद को है SC-ST सूची में बदलाव का अधिकार’
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने अपने हलफनामे में संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का उल्लेख करते हुए कहा कि SC और ST की सूची में संशोधन या बदलाव करने का अधिकार विशेष रूप से केवल देश की संसद के पास है. केंद्र ने ऐतिहासिक इंदिरा साहनी (मंडल कमीशन) फैसले का उदाहरण देते हुए कहा कि SC, ST और OBC समुदायों का वर्गीकरण ऐतिहासिक सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर आधारित है, न कि केवल आर्थिक स्थिति पर.
कल्याणकारी योजनाओं में पहले से लागू हैं आय मानक
केंद्र का यह भी कहना है कि SC, ST और SEBC समुदायों के लिए चलाई जा रही ज्यादातर सरकारी व कल्याणकारी योजनाओं में आय सीमा का प्रावधान पहले से ही मौजूद है, ताकि जरूरतमंदों को सहायता मिल सके. केंद्र के अनुसार, याचिकाकर्ताओं के पास इस बात के ठोस आंकड़े या तर्क नहीं हैं कि मौजूदा व्यवस्था से गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों को क्या नुकसान हो रहा है.

‘IAS अधिकारियों की संतानों को क्यों मिले आरक्षण?’
इससे पहले 22 मई को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने एक अहम सवाल खड़ा किया था. जिसमें अदालत ने पूछा था कि यदि किसी बच्चे के माता-पिता दोनों ही उच्च प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत हैं, तो ऐसी स्थिति में उनकी संतानों को आरक्षण का फायदा क्यों दिया जाना चाहिए? जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने टिप्पणी की थी कि जब किसी परिवार में शिक्षा और आर्थिक समृद्धि के जरिए सामाजिक प्रतिष्ठा मजबूत हो जाती है, तब यह विचार करना जरूरी हो जाता है कि क्या आने वाली पीढ़ियों को भी लगातार आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए या नहीं. गौरतलब है कि यह टिप्पणी कर्नाटक के एक OBC अभ्यर्थी से जुड़े मामले की सुनवाई के समय सामने आई थी, जिसे क्रीमी लेयर की आय सीमा के अंतर्गत आने की वजह से आरक्षण के दायरे से बाहर कर दिया गया था.




