Kathgarh Mahadev Temple: दो हिस्सों में बंटा है शिवलिंग, घटती-बढ़ती दूरी के बीच एक साथ होते हैं शिव-शक्ति के दर्शन!

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हिमाचल प्रदेश और पंजाब की सीमा पर, ब्यास नदी के तट पर स्थित काठगढ़ महादेव मंदिर भारत के सबसे रहस्यमयी और चमत्कारिक शिवधामों में से एक है. यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि इसका इतिहास पौराणिक काल, वैदिक युग और सिकंदर महान की विश्व-विजय यात्रा से भी जुड़ा हुआ है.

ब्रह्मा और विष्णु के युद्ध को शांत करने प्रकट हुआ था ‘अग्नि स्तंभ’

शिवपुराण के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और पालनहार भगवान विष्णु के बीच अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर भीषण युद्ध छिड़ गया. जब यह युद्ध महाप्रलय का रूप लेने लगा, तब भगवान शिव दोनों देवों के मध्य एक असीम अग्नि-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए. इसी स्थान पर प्रकट होकर भोलेनाथ ने दोनों के अहंकार और युद्ध को शांत किया था. माना जाता है कि काठगढ़ का यह शिवलिंग उसी दिव्य ज्योति स्तंभ का प्रतीक है.

शिवलिंग और पार्वती भाग का अनोखा मिलन

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां का दो भागों में विभाजित शिवलिंग है. मुख्य शिवलिंग जिसे शिव वाला भाग माना जाता है इसकी ऊंचाई लगभग 5.5 फीट है. इस शिवलिंग से सटा हुआ एक और पत्थर है जिसे पार्वती भाग माना जाता है. इससे मात्र 2 इंच की दूरी पर स्थित यह पत्थर मुख्य शिवलिंग से लगभग डेढ़ फीट छोटा है. हर साल मकर संक्रांति तक शिव और पार्वती रूपी इन दोनों पत्थरों के बीच की दूरी घटने लगती है और फिर धीरे-धीरे बढ़ने लगती है. वैज्ञानिक भी इस भौगोलिक और प्राकृतिक घटना को देखकर हैरान रह जाते हैं.

दूध के मटके और राजा की खुदाई वाली जनश्रुति

कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहां चरवाहे अपने दूध के मटके इस शिवलिंग रूपी चट्टान पर रखते थे. जब यह चट्टान ऊपर उठने लगती, तो भैरव जी इसे तराश कर छोटा कर देते थे. जब स्थानीय राजा को इस बात का पता चला, तो उन्होंने विद्वानों के परामर्श से श्रावण मास में शिव पूजन करवाया, जिसके बाद यहां शिव-पार्वती की यह अलौकिक प्रतिमा पूर्ण रूप से प्रकट हुई.

भरत जी की विश्राम स्थली

काठगढ़ धाम की महत्ता रामायण काल में भी मिलती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के अनुज भरत जी जब भी अपने ननिहाल जाते थे, तो ब्यास नदी पार करने के बाद इसी पावन स्थल पर स्नान करते थे और भगवान शिव की आराधना करके विश्राम करते थे.

‘काठगढ़’ नाम कैसे पड़ा?

प्राचीन जनश्रुतियों के अनुसार, यह क्षेत्र कभी 4-5 गांवों का एक विशाल और समृद्ध व्यापारिक कस्बा हुआ करता था, जहां 22 तेल के कोल्हू चला करते थे. नगर के एक भाग में मुकदमों के फैसले होते थे. दूसरे भाग (वर्तमान काठगढ़) में अपराधियों को सजा देने के लिए काठ (लकड़ी का शिकंजा) लगाया जाता था. इसी काठ लगाने के स्थान के कारण इस गांव का नाम काठगढ़ हो गया. आज भी ज़मीन की खुदाई करने पर यहां प्राचीन ईंटें, मिट्टी के बर्तन और ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं.

काठगढ़ मंदिर का निर्माण

वैदिक काल से खुले आकाश के नीचे पूजे जाने वाले इस स्वयंभू शिवलिंग पर मंदिर का निर्माण महाराजा रणजीत सिंह ने करवाया था. जब महाराजा रणजीत सिंह ने अपने राज्य का दौरा किया, तो इस अष्टकोणीय और अलौकिक शिवलिंग के दर्शन कर उनका हृदय गद्गद हो गया. उन्होंने तुरंत सरकारी कोष से यहां एक भव्य मंदिर और परिक्रमा चबूतरे का निर्माण करवाया. कहा जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह अपने किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत के लिए यहां के प्राचीन कुएं का पवित्र जल मंगवाया करते थे.

सिकंदर का भारत से वापसी स्थल

इतिहासकारों के अनुसार, विश्व विजेता बनने का सपना लेकर निकले मकदूनिया (मैसिडोनिया) के राजा सिकंदर महान का अंतिम पड़ाव यही काठगढ़ क्षेत्र था. प्रसिद्ध इतिहासकारों के अनुसार जब सिकंदर की सेना काठगढ़ पहुंची, तो भारतीय वीरों के पराक्रम और इस पावन भूमि के आध्यात्मिक प्रभाव को देखकर यूनानी सैनिकों ने आगे बढ़ने से साफ़ इनकार कर दिया. सिकंदर जब सुबह सोकर उठा, तो उसने अनुभव किया कि उसके अपराजेय सैनिकों का मनोबल इस दिव्य शिवलिंग की आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण बदला है. इसके बाद सिकंदर ने यहां शिवलिंग के चारों ओर समतल चारदीवारी और ब्यास नदी के तट पर अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए, ताकि भावी पीढ़ियां इसे सिकंदर के भारत से वापसी के ऐतिहासिक स्थल के रूप में याद रखें. ये ऐतिहासिक अवशेष आज भी यहां विद्यमान हैं.

वर्तमान व्यवस्था एवं धार्मिक आयोजन

महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां 4 दिनों का भव्य मेला लगता है. लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और कई बार कतार में खड़े होकर दर्शन पाने में 50 से 60 घंटे का समय लगता है. मंदिर में हर सोमवार को विशाल लंगर का आयोजन होता है.

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