विज्ञान के लिए पहेली: महाराष्ट्र के ‘चेरापूंजी’ में स्थित श्री हिरण्यकेशी मंदिर का अनसुलझा रहस्य

रहस्य की बात यह है कि कोई भी इस मूल शिवलिंग को सीधे देख नहीं सकता, क्योंकि इसके ऊपर एक दूसरा काला शिवलिंग स्थापित किया गया है, जो हमेशा मूल शिवलिंग को ढके रखता है. दैनिक पूजा-अर्चन भी इसी ऊपरी शिवलिंग पर की जाती है.

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आंबोली: क्या आप किसी ऐसी जगह की कल्पना कर सकते हैं, जहां कदम रखते ही मौसम की ठिठुरन अचानक एक अलौकिक गर्माहट में बदल जाए? एक ऐसा स्थान, जहां घने और रहस्यमयी अरण्य के बीच स्थित एक प्राचीन गुफा से पूरी की पूरी नदी का जन्म होता है! और एक ऐसा मंदिर, जिसके मुख्य गर्भगृह में स्थापित असली शिवलिंग को आज तक कोई भी भक्त सीधे नहीं देख पाया! आज हम बात कर रहे हैं महाराष्ट्र के चेरापूंजी कहे जाने वाले ‘आंबोली घाट’ के सबसे बड़े और विस्मयकारी रहस्य श्री हिरण्यकेशी मंदिर की। इस पवित्र स्थान के कई रहस्य आज भी आधुनिक विज्ञान के लिए एक अनसुलझी पहेली बने हुए हैं।

नाम का शास्त्रोक्त रहस्य और दोहरे शिवलिंग का विधान

स्थानीय लोग और श्रद्धालु इसे भले ही ‘हिरण्याक्षी मंदिर’ कहते हों, लेकिन शास्त्रों और इतिहास में इसे ‘श्री हिरण्यकेशी मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। संस्कृत में ‘हिरण्यकेशी’ का अर्थ है स्वर्णमयी जटाओं (सोने के बालों) वाली देवी, जो साक्षात माता पार्वती का ही एक दिव्य रूप हैं। इस मंदिर की सबसे अनोखी बात इसका गर्भगृह है। यहां एक स्वयंभू लाल पत्थर का शिवलिंग स्थापित है, जिसे ‘हिरण्यकेश्वर’ कहा जाता है। रहस्य की बात यह है कि कोई भी इस मूल शिवलिंग को सीधे देख नहीं सकता, क्योंकि इसके ऊपर एक दूसरा काला शिवलिंग स्थापित किया गया है, जो हमेशा मूल शिवलिंग को ढके रखता है। दैनिक पूजा-अर्चन भी इसी ऊपरी शिवलिंग पर की जाती है।

परम भक्त का स्वप्न और दिव्य खोज

इस घने जंगल में इस प्राचीन मंदिर की खोज की कहानी भी बेहद दिव्य है। साल 1938 के आसपास यह पूरा इलाका इतना घना और खूंखार जंगल था कि स्थानीय लोग भी यहां कदम रखने से डरते थे। तब ‘पेंडसे भटजी’ नाम के एक परम शिवभक्त को शांडिल्य ऋषि ने स्वप्न में दर्शन देकर इस सुदूर अरण्य के भीतर दबे महादेव के स्वयंभू स्थान को खोजने और पूजा शुरू करने का आदेश दिया। भटजी ने कड़े संघर्ष के बाद इस पवित्र गुफा को ढूंढ निकाला और 1938 से 1975 तक यहाँ निस्वार्थ सेवा की। उनकी आस्था इतनी अटूट थी कि उनकी अंतिम इच्छानुसार, उनकी समाधि मंदिर के ठीक सामने बहती नदी के पेट में बनाई गई, जिसके ऊपर से आज भी नदी का पवित्र जल निरंतर प्रवाहित होता है।

पर्वतारोहियों का अभियान और गुफा के भीतर ‘पाताल लोक’

असली रहस्य तो इस मंदिर के पीछे बनी उस रहस्यमयी गुफा में छिपा है, जहां से हिरण्यकेशी नदी का उद्गम होता है। लगभग 250 से 300 मीटर लंबी इस गुफा के बारे में मान्यता है कि यह नदी पाताल की सात गुफाओं से होकर यहाँ प्रकट होती है।इस रहस्य को सुलझाने के लिए जनवरी 1981 में पुणे के जांबाज पर्वतारोहियों की एक टीम इस अंधेरी गुफा के भीतर दाखिल हुई थी। उनकी खोज हैरान करने वाली थी। गुफा के अंदर पानी के सात अद्भुत कुंड हैं और गहरे हिस्से में एक विशाल हॉल जैसा कमरा है, जहां 200 लोग एक साथ खड़े हो सकते हैं। सबसे बड़ा रहस्य यह है कि गुफा के आखिरी छोर पर, बिना किसी बाहरी रास्ते के, पानी पर अचानक सूर्य की किरणें चमकती दिखाई देती हैं। यह रोशनी कहाँ से आती है, यह आज तक कोई नहीं जान पाया।

वैज्ञानिक खोज: ‘देवाचा मासा’ और वैश्विक विरासत

साल 2020 में वैज्ञानिकों ने खोजा कि मंदिर के पवित्र कुंड में पाई जाने वाली एक खास मछली, जिसे स्थानीय लोग श्रद्धा से ‘देवाचा मासा’ (भगवान की मछली) कहते हैं, दुनिया में और कहीं नहीं पाई जाती। नदी के सम्मान में इसका नाम ‘शिस्टुरा हिरण्यकेशी’ (Schistura hiranyakeshi) रखा गया है। इसी अनूठी जैव-विविधता के कारण महाराष्ट्र सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर ‘जैव-विविधता विरासत स्थल’ घोषित किया है।

मानसून का जादू: नीली रोशनी और सुनहरे मेंढक

मानसून के दिनों में आंबोली में 7,000 मिलीमीटर से भी ज्यादा बारिश होती है। इस समय बादलों की धुंध सीधे मंदिर के आंगन तक उतर आती है और गुफा के भीतर पानी का दबाव बढ़ने से नदी का जल भयंकर गर्जना के साथ बाहर फूटता है। यदि आप मानसून की रात में इस मंदिर के आसपास के जंगलों में निकलें, तो आपको पेड़ों पर चमकते हुए नीले-हरे रंग के बायोल्यूमिनेसेंट कवक (Fungi) और अति-दुर्लभ पीले-काले रंग के मेंढक दिखाई देंगे। चमकीले पीले और काले रंग का यह दुर्लभ मेंढक केवल आंबोली के लेटेराइट पठार पर पाया जाता है, जो इस रात को किसी परीकथा जैसी जादुई बना देता है।

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