रामायण का युद्ध समाप्त हो चुका था। लंका की रणभूमि रक्त से लाल थी और सामने पड़ा था एक ऐसा योद्धा जिसका अंत काल के लिए भी असंभव माना जाता था—दशानन रावण। लेकिन जीत के उस महान क्षण में जश्न से ज्यादा सन्नाटा था, क्योंकि एक खौफनाक विवाद ने जन्म ले लिया था। जिस रावण के एक इशारे पर कभी दसों दिशाएं कांपती थीं, उसकी मृत्यु के बाद लंका में यह सवाल उठा कि आखिर उसे मुखाग्नि कौन देगा?
जब विभीषण ने खींच लिए थे हाथ
इतिहास गवाह है कि युद्ध के बाद सगे भाई विभीषण ने रावण के शव को छूने से इनकार कर दिया था। विभीषण का तर्क था कि जिसने माता सीता का हरण किया और धर्म का विनाश किया, उस पापी का अंतिम संस्कार करके वे अपने हाथ अपवित्र नहीं करेंगे। परिवार के सारे योद्धा पहले ही वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और रावण का शव लावारिस होने की कगार पर था।
मरणान्तानि वैराणि: राम की महानता
नफरत के उस माहौल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने विभीषण को इतिहास का सबसे बड़ा सबक देते हुए कहा— ‘मरणान्तानि वैराणि’, यानी दुश्मनी केवल प्राणों तक होती है, मृत्यु के साथ ही सारे बैर समाप्त हो जाते हैं। राम ने सबको चौंकाते हुए कहा, “रावण अब मेरा भी भाई है।” उन्होंने घोषणा की कि यदि विभीषण पीछे हटते हैं, तो वे स्वयं अपने शत्रु का अंतिम संस्कार करेंगे। राम की इसी करुणा ने विभीषण का हृदय परिवर्तन किया और लंकाधिपति का दाह संस्कार पूरे राजकीय सम्मान और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुआ।
रैगला के जंगलों का रहस्य: क्या रावण आज भी जीवित है?
लेकिन, क्या रावण की कहानी उस चिता की राख के साथ ही खत्म हो गई थी? श्रीलंका की लोक मान्यताओं और रैगला के जंगलों की पहाड़ियों में एक अलग ही कहानी दफन है। दावा किया जाता है कि रावण की मृत्यु के बाद नागकुल के लोग उसके शव को सम्मानपूर्वक एक गुप्त स्थान पर ले गए थे। उन्हें विश्वास था कि रावण की मृत्यु केवल एक मूर्च्छा है और वह पुनर्जीवित होगा। आज भी रैगला के घने और दुर्गम जंगलों में, समुद्र तल से 8,000 फीट की ऊँचाई पर एक ऐसी गुफा का जिक्र होता है, जहां 18 फीट लंबा एक रहस्यमयी ताबूत रखा है। कहा जाता है कि इस ताबूत पर एक खास किस्म का लेप (ममीफिकेशन की तकनीक) लगा है, जिसने हजारों वर्षों से रावण के शव को सुरक्षित रखा है।
विज्ञान और विश्वास के बीच की पहेली
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह गुफा आज भी एक पहेली बनी हुई है। भारत के ग्रंथ जहाँ दाह संस्कार की पुष्टि करते हैं, वहीं श्रीलंका की किंवदंतियां उस ताबूत की ओर इशारा करती हैं। क्या वाकई रावण की राख समुद्र में मिल गई थी, या फिर लंका का वह महान सम्राट आज भी किसी अंधेरी गुफा में अपनी अगली जागृति का इंतज़ार कर रहा है?




