पणजी: गोवा की धरती सिर्फ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए भी जानी जाती है. यहां की एक ऐसी अनूठी परंपरा है जो सदियों से धर्म की सीमाओं को लांघकर प्यार और भाईचारे का संदेश दे रही है. यह कहानी है सिरिगाओ की देवी लैराई और मपुसा की मिलाग्रीस सायबीन (अवर लेडी ऑफ मिरेकल्स) की, जिन्हें गोवा के लोग आज भी सगी बहनें मानते हैं.
सात बहनों का पौराणिक सफर
लोक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में सात बहनें और उनका एक भाई खेतोबा समंदर पार कर गोवा आए थे. ये सातों बहनें—लैराई, मिलाग्रीस, महामाया, केलबाई, मोर्चाई, शीतल और अजदीपा अलग-अलग गांवों में जाकर बसीं. कहा जाता है कि जब मिलाग्रीस ने ईसाई धर्म को अपनाया और मापुसा के सेंट जेरोम चर्च में स्थापित हुईं, तब भी उनका अपनी बहनों, खासकर देवी लैराई के साथ रिश्ता नहीं टूटा. आज भी गोवा के लोग इन्हें बहनें कहकर ही संबोधित करते हैं.
लैराई जत्रा: अग्नि पर आस्था की विजय
वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी को सिरिगाओ में आयोजित होने वाली ‘लैराई जत्रा’ गोवा के सबसे भव्य उत्सवों में से एक है. यहां ‘धोंड’ (श्रद्धालु) हफ्तों का कड़ा उपवास और शुद्धता का पालन करते हैं. उत्सव की रात मंदिर के सामने लकड़ियों का एक विशाल ढेर होम जलाया जाता है. जब ये लकड़ियां दहकते अंगारों में बदल जाती हैं, तब हजारों धोंड नंगे पैर उन पर से दौड़ते हैं. इस जत्रा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मुख्य ज्योत जलाने के लिए पवित्र तेल मपुसा के मिलाग्रीस चर्च से भेजा जाता है.
मिलाग्रीस फिस्ट: श्रद्धा का अनोखा संगम
ईस्टर के बाद दूसरे सोमवार को मपुसा में ‘मिलाग्रीस फिस्ट’ मनाया जाता है. इस दिन चर्च का नजारा देखने लायक होता है, जहां हिंदू और ईसाई दोनों समुदायों के लोग भारी संख्या में उमड़ते हैं. मिलाग्रीस माता को तेल चढ़ाने की रस्म यहां की मुख्य परंपरा है. इस विशेष अवसर पर सिरिगाओ के लैराई मंदिर से एक प्रतिनिधिमंडल चमेली के फूलों का पारंपरिक हार लेकर चर्च पहुंचता है, जिसे माता की प्रतिमा को पहनाया जाता है.
विरासत जो दिलों को जोड़ती है
यह परंपरा सदियों से निर्बाध रूप से चली आ रही है. आज के आधुनिक दौर में भी मंदिर के पुजारी और चर्च के पादरी इस रस्म को पूरी निष्ठा के साथ निभाते हैं. यह रिश्ता केवल दो धार्मिक स्थलों का नहीं, बल्कि गोवा की उस साझी विरासत का है जिसे यहां के लोग गोएंकारपण कहते हैं. लैराई और मिलाग्रीस की यह कहानी दुनिया को सिखाती है कि मजहब भले ही अलग हों, लेकिन आपसी प्रेम और सम्मान की जड़ें हमेशा एक ही होती हैं.




