450 साल के पुर्तगाली दमन को मात देकर आज भी सीना ताने खड़ा है गोवा का ‘श्री नागेशी मंदिर’

दिर की उत्पत्ति की कथा एक चरवाहे से जुड़ी है, जिसने देखा कि उसकी एक गाय रोज़ाना जंगल के एक विशेष पत्थर पर अपना दूध स्वतः अर्पित कर देती है. जब ग्रामीणों ने उस स्थान की खुदाई की, तो वहां से एक भव्य शिवलिंग प्रकट हुआ.

0
56

पणजी: गोवा की पहचान अक्सर इसके समुद्र तटों और पुर्तगाली वास्तुकला से की जाती है, लेकिन इन शोर-शराबे वाली गलियों से दूर पोंडा के बांदोड़ा गांव में एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र है, जिसने वक्त के क्रूर थपेड़ों को सहकर भी अपनी पहचान नहीं खोई. यह कहानी है स्वयंभू नागेशी मंदिर की एक ऐसा मंदिर जो न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्राचीन इंजीनियरिंग और गोवा के गौरवशाली इतिहास का जीता-जागता साक्ष्य भी है.

चमत्कार से शुरू हुआ सफर

स्थानीय लोक कथाओं और नागव्य महात्म्य के अनुसार, सदियों पहले यह समूचा क्षेत्र शमी के घने जंगलों से घिरा हुआ था. मंदिर की उत्पत्ति की कथा एक चरवाहे से जुड़ी है, जिसने देखा कि उसकी एक गाय रोज़ाना जंगल के एक विशेष पत्थर पर अपना दूध स्वतः अर्पित कर देती है. जब ग्रामीणों ने उस स्थान की खुदाई की, तो वहां से एक भव्य शिवलिंग प्रकट हुआ. भगवान शिव का यही रूप नागेश (सर्पों के स्वामी) कहलाया. चूंकि यह शिवलिंग किसी मानवीय रचना का परिणाम नहीं था, इसे स्वयंभू माना गया.

विस्थापन के दौर में अडिग रहा मंदिर

गोवा के इतिहास का एक काला अध्याय पुर्तगाली इनक्विजिशन का दौर था, जिसमें अनगिनत मंदिरों को तोड़ा गया या विस्थापित किया गया. लेकिन नागेशी मंदिर अपनी मूल जगह पर अडिग खड़ा रहा. इसका मुख्य कारण फोंडा (अंत्रुज महाल) की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति थी. उस दौर में यह क्षेत्र पुर्तगालियों के सीधे नियंत्रण में न होकर मराठा और सुंडा राजाओं के प्रभाव में था. यही वजह है कि साल्सेट से विस्थापित होकर आईं देवी महालक्ष्मी को भी इसी परिसर में शरण मिली.

इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना: ‘नागेशी ताली’

मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसके सामने स्थित विशाल जल कुंड है, जिसे नागेशी ताली कहा जाता है. इस कुंड की बनावट आज के वैज्ञानिकों को भी सोचने पर मजबूर कर देती है. यदि आप कुंड के एक निश्चित बिंदु पर खड़े होकर पानी में देखें, तो आपको गर्भगृह के भीतर रखे शिवलिंग और वहां जलते दीपों का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देगा.

इतिहास और कला का संगम

  • शिलालेख: मंदिर प्रांगण में मौजूद साल 1413 का शिलालेख विजयनगर साम्राज्य के राजा वीर प्रताप देवराय के समय का है. यह कोंकणी भाषा के प्रारंभिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण लिखित दस्तावेज माना जाता है.
  • कावी कला: मंदिर की दीवारों पर कोंकण की लुप्त होती कावी कला देखने को मिलती है, जिसमें लाल मिट्टी और समुद्री सीपी के चूने का उपयोग कर अद्भुत नक्काशी की गई है.
  • काष्ठ कला: मंदिर के लकड़ी के खंभों पर रामायण और महाभारत के दृश्यों को इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि वे जीवंत प्रतीत होते हैं.

अजेय पहचान की प्रतीक

पुरातत्वविदों को यहां 7वीं और 8वीं शताब्दी की प्राचीन प्रतिमाएं मिली हैं, जो इस स्थान के 1300 साल से भी अधिक पुराने होने की पुष्टि करती हैं. हर साल कार्तिक और चैत्र पूर्णिमा पर जब मंदिर का पांच मंजिला दीपस्तंभ रोशनी से जगमगाता है, तो यह अहसास होता है कि परंपराएं और आस्था वक्त से कहीं ज्यादा ताकतवर होती हैं. आज नागेशी मंदिर केवल पत्थरों की एक इमारत नहीं है, यह गोवा की उस पहचान का हिस्सा है जो कभी नहीं झुकी.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here