पणजी: गोवा की पहचान आज उसके खूबसूरत समुद्र तटों और पुर्तगाली वास्तुकला से होती है, लेकिन इन चमकते गिरजाघरों और रेत के नीचे इतिहास का एक ऐसा पन्ना दबा है, जो रोंगटे खड़े कर देता है. क्या आपने कभी सुना है कि किसी पत्थर के मंदिर को ‘मौत की सजा’ दी गई हो? जी हां, यह कहानी है श्री गोमंतेश्वर महादेव मंदिर की, जिसे हथौड़ों से तोड़ा नहीं गया, बल्कि मलबे और चूने के नीचे जिंदा दफन कर दिया गया था.
विजयनगर साम्राज्य और ब्रह्मपुरी की स्थापना
इस कहानी के तार 14वीं शताब्दी से जुड़ते हैं. जब विजयनगर साम्राज्य के महान सेनापति माधव मंत्री ने गोवा को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त कराया, तो उन्होंने यहां ‘ब्रह्मपुरी’ की स्थापना की. यह स्थान विद्वानों, वेदों और संस्कृति का केंद्र बना. इसी के हृदय स्थल में स्थापित हुए गोमंतेश्वर महादेव. इस मंदिर को बनाने के लिए काले बेसाल्ट पत्थरों को मीलों दूर पश्चिमी घाटों से लाया गया था. मंदिर की बनावट ऐसी थी कि बिना किसी आधुनिक तकनीक के, इसके भीतर का तापमान हमेशा शीतल बना रहता था.
सन 1779: जब मंदिर को ‘अदृश्य’ कर दिया गया
इतिहास का सबसे काला मोड़ तब आया जब पुर्तगाली वायसराय डीसूजा ने एक अजीबोगरीब आदेश जारी किया. उसने मंदिर को ध्वस्त करने के बजाय उसे पूरी तरह से मिट्टी और मलबे से ढकने का हुक्म दिया. रातों-रात महादेव का यह भव्य दरबार एक कृत्रिम पहाड़ के नीचे गुम हो गया.आखिर पुर्तगाली शासन को डर किस बात का था? आधिकारिक दस्तावेजों की मानें तो उन्हें डर था कि मराठा जासूस तीर्थयात्रियों के वेश में इस गुप्त स्थान का उपयोग करेंगे. लेकिन क्या सच सिर्फ इतना था? या उस मलबे के नीचे कोई ऐसा रहस्यमयी तहखाना था जिसे पुर्तगाली दुनिया की नजरों से दूर रखना चाहते थे?
इजरायली शोध और ‘मिक्वाह’ का रहस्य
मंदिर के पास स्थित माधव तीर्थ (पवित्र कुंड) आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली है. साल 2017 में हुए पुरातात्विक सर्वेक्षणों में एक चौंकाने वाला दावा सामने आया. इजरायली शोधकर्ताओं के अनुसार, इस कुंड की बनावट पारंपरिक हिंदू ‘पुष्करिणी’ से ज्यादा यहूदी धर्म के पवित्र स्नान ‘मिक्वाह’ (Mikveh) से मिलती है. सात सीढ़ियां और झरने का निरंतर प्रवाह… क्या 15वीं शताब्दी में यहां हिंदू और यहूदी संस्कृतियों का मिलन होता था? क्या यह मंदिर किसी प्राचीन विश्व-सभ्यता का गुप्त केंद्र था?
मलबे से महादेव की वापसी
आजादी के बाद साल 1947 में इस दफन मंदिर को खोजा गया और इसे इसके ‘मिट्टी के पिंजरे’ से आजाद कराया गया. आज यह गोवा का एक संरक्षित विरासत स्थल (Heritage Site) है. हर महाशिवरात्रि पर यहां गूंजते ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे इस बात का प्रमाण हैं कि आस्था को चाहे कितनी भी गहराई में दफन कर दिया जाए, सत्य एक दिन बाहर जरूर आता है. गोमंतेश्वर महादेव मंदिर केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उस संघर्ष की निशानी है जिसने समय के थपेड़ों को सहा और अपनी पहचान को बचाए रखा.




