शांतादुर्गा मंदिर: जहां महादेव और विष्णु के महायुद्ध के बीच ढाल बनकर खड़ी हो गईं माता पार्वती!

गोवा के पोंडा में स्थित 'श्री शांतादुर्गा मंदिर' सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था और साहस की जीती-जागती मिसाल है. सन 1564 में जब पुर्तगाली इस मंदिर को मिटाने आए, तो भक्त जान हथेली पर रखकर माता को पालकी में छिपाकर जंगलों के रास्ते ले आए.

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गोवा: कल्पना कीजिए एक ऐसे युद्ध की, जहां आमने-सामने स्वयं महादेव और भगवान विष्णु थे! एक ऐसा टकराव, जिससे पूरी सृष्टि का अंत निश्चित था. लेकिन तभी, एक दिव्य शक्ति बीच में खड़ी हो गई. उन्होंने एक हाथ से काल के देवता शिव को थामा, तो दूसरे हाथ से सृष्टि के पालनहार विष्णु को… और पल भर में विनाशकारी युद्ध, असीम शांति में बदल गया. गोवा के पोंडा में स्थित श्री शांतादुर्गा मंदिर इसी अद्भुत शांति का जीवंत प्रमाण है.

क्यों कहलाईं ‘शांतादुर्गा’?

स्कंद पुराण के अनुसार, एक समय भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया था. ब्रह्मा जी के आग्रह पर माता पार्वती ने हस्तक्षेप किया. उन्होंने ‘शांता’ का रूप धारण किया और दोनों देवताओं को शांत कराया.जब आप मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं, तो आपको एक ऐसी मूर्ति दिखती है जो दुनिया में कहीं और नहीं है. माता शांतादुर्गा की प्रतिमा के दोनों हाथों में दो नाग हैं. ये नाग स्वयं भगवान शिव और विष्णु के प्रतीक हैं, जिन्हें माता ने थाम रखा है.

जान पर खेलकर बचाई गई विरासत

ये मंदिर हमेशा से पोंडा में नहीं था. इतिहास के पन्नों को पलटें तो उसके अनुसार ये मंदिर साल्सेट के ‘केलोशी’ (Keloshi) गांव में स्थित था. सन 1564 में जब पुर्तगाली मिशनरियों ने मंदिर को ध्वस्त करने की योजना बनाई, तब स्थानीय गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय ने अदम्य साहस का परिचय दिया. पुर्तगालियों की आँखों में धूल झोंककर, भक्त रात के अंधेरे में माता की मूर्ति को पालकी में छिपाकर घने जंगलों के रास्ते पोंडा ले आए. उस समय यह इलाका बीजापुर सल्तनत के अधीन था, जहां हिंदू धर्म सुरक्षित था.

इंडो-पुर्तगाली और मराठा वैभव का संगम

कवलम में लगभग 200 साल तक माता एक मिट्टी के छोटे घर में विराजमान रहीं. वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण करीब 300 साल पहले सतारा के मराठा शासक छत्रपति साहू महाराज के मंत्री नरो राम मंत्री ने करवाया था. यहां का 5 मंजिला ऊंचा ‘दीप स्तंभ’ मुख्य आकर्षण है. उत्सवों के दौरान जब यहाँ हज़ारों दीये जलते हैं, तो मंदिर स्वर्ण नगरी जैसा प्रतीत होता है. मंदिर की सोने की पालकी अपनी बारीक नक्काशी के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है, जिसे केवल विशेष अवसरों पर निकाला जाता है.

मंदिर के नियम और परंपराएं

शांतादुर्गा माता शांति की प्रतीक हैं, इसलिए मंदिर परिसर में शोर-शराबा पूरी तरह वर्जित है. यहां भक्तों के लिए एक सख्त ड्रेस कोड लागू है, ताकि स्थान की पवित्रता और मर्यादा बनी रहे. ये निजी मंदिर आज न केवल GSB समुदाय की, बल्कि पूरे गोवा की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. श्री शांतादुर्गा मंदिर की गाथा हमें सिखाती है कि सच्ची आस्था को कोई भी सत्ता या दीवार दबा नहीं सकती. अगर भक्त एकजुट हों, तो इतिहास की धारा बदली जा सकती है. कवलम की ये धरती आज भी हमें शांति और न्याय का संदेश दे रही है.

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