गोवा का वो मंदिर जहां कानून नहीं, ‘न्याय का घंटा’ सजा सुनाता था… श्री महालसा नारायणी का अनसुना रहस्य

भगवान विष्णु के एकमात्र स्त्री अवतार 'मोहिनी' को समर्पित यह मंदिर अपने भीतर कई ऐसे रहस्य समेटे हुए है, जो आज भी विज्ञान और तर्क को चुनौती देते हैं. आइए जानते हैं, क्यों महालसा देवी ने जनेऊ धारण किया है और कैसे भक्तों ने अपनी जान पर खेलकर देवी के वजूद को पुर्तगाली तोपों से बचाया था.

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Mahalasa Narayani Temple

गोवा: क्या आप किसी ऐसी अदालत की कल्पना कर सकते हैं जहां न्यायाधीश कोई इंसान नहीं, बल्कि एक विशाल पीतल का घंटा हो? एक ऐसा दरबार जहां झूठ बोलने की हिम्मत बड़े-बड़े अपराधी भी नहीं करते थे क्योंकि उन्हें डर था साक्षात देवी के उस न्याय का जिससे उस दौर में पुर्तगाली भी कांपते थे. आज हम बात कर रहे हैं गोवा के प्रसिद्ध श्री महालसा नारायणी (Shri Mahalasa Narayani) मंदिर की, जो अपने अद्भुत इतिहास और रहस्यों के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है.

समुद्र मंथन और मोहिनी अवतार की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच क्षीर सागर का मंथन हुआ, तब असुरों ने छल से अमृत कलश छीन लिया. ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया. उन्होंने अपनी सुंदरता से असुरों को मोहित कर अमृत देवताओं में वितरित कर दिया. मोहिनी का यही दिव्य स्वरूप आज गोवा के मारडोल (Mardol) में महालसा नारायणी के रूप में पूजा जाता है.

जनेऊ वाली देवी

इस मंदिर की सबसे अनोखी बात, जो इसे दुनिया के अन्य मंदिरों से अलग बनाती है, वह है देवी की प्रतिमा. महालसा देवी ने यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किया है. आमतौर पर जनेऊ केवल पुरुष देवताओं या ब्राह्मणों द्वारा धारण किया जाता है, लेकिन यहां यह देवी के विष्णु अवतार होने का जीवंत प्रमाण है. देवी के चार हाथों में त्रिशूल, तलवार, अमृत कलश और एक कटा हुआ सिर है, जो बुराई के विनाश का प्रतीक है.

इतिहास का खौफनाक पन्ना: 1567 का वो महा-रेस्क्यू

महालसा देवी का मूल स्थान साल्सेट का वेर्ना (Verna) था. साल 1567 में जब पुर्तगाली शासन ने इस प्राचीन मंदिर को नष्ट करने का फरमान जारी किया, तब सनातन संस्कृति पर बड़ा संकट मंडरा रहा था. लेकिन भक्तों की श्रद्धा अटूट थी. तोपों और तलवारों के साये में, आधी रात को देवी की मूर्ति को पालकी में रखा गया और जुवारी नदी की लहरों को पार कर सुरक्षित मारडोल पहुंचाया गया. कहा जाता है कि यह प्रतिमा मूल रूप से नेपाल से औरंगाबाद और फिर गोवा पहुँची थी।

न्याय का घंटा

मारडोल के इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण है न्याय का घंटा. प्राचीन समय में इस विशाल पीतल के घंटे का उपयोग गवाही के लिए किया जाता था. मान्यता थी कि यदि कोई इस घंटे के सामने झूठ बोलता, तो देवी उसे तीन दिनों के भीतर दंड देती थीं. पुर्तगाली प्रशासन के दौरान भी इस मंदिर में दी गई गवाही को अदालत में सर्वोच्च मान्यता प्राप्त थी.

मोहिनी और खंडोबा

सिर्फ विष्णु अवतार ही नहीं, स्थानीय लोककथाओं में महालसा को भगवान शिव के अवतार मल्हारी मार्तंड (खंडोबा) की पत्नी और माता पार्वती का स्वरूप भी माना जाता है. महाराष्ट्र के नेवासा से लेकर गोवा के मारडोल तक, यह कथा भक्तों को भक्ति के एक अनूठे सूत्र में पिरोती है. आज मारडोल का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का रक्षक है. यहां की माघ जात्रा और हर रविवार निकलने वाली पालकी उत्सव इस बात का प्रमाण है कि सनातन को मिटाने की कोशिशें भले ही कितनी हुईं, लेकिन आस्था की ज्योति हमेशा जलती रहेगी.

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