Padma Chorol: भारतीय महिला आइस हॉकी की वो आवाज, जिसने लड़कों के साथ खेलकर लिखी कामयाबी की इबारत

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Padma Chorol
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लेह (लद्दाख): जब हौसले बुलंद हों, तो पहाड़ों की बर्फ भी रास्ता देने लगती है। यह कहानी है पद्मा चोरोल की, जो आज भारतीय महिला आइस हॉकी टीम का एक जाना-माना नाम हैं। लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने के लिए पद्मा ने उस दौर में संघर्ष शुरू किया था, जब लद्दाख की बर्फीली सतह पर लड़कियों का खेलना एक दुर्लभ बात मानी जाती थी।

भाइयों का साथ और लड़कों के बीच ट्रेनिंग

पद्मा के खेल की शुरुआत महज 10 साल की उम्र में स्पीड स्केटिंग से हुई थी। खेल उनके खून में था—उनके भाई नवांग स्तुपदान और तायनांग दोर्जे (सेना के आइस स्केटर) ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। पद्मा याद करती हैं, “शुरुआत में लड़कियों की कोई टीम नहीं थी। मुझे मजबूरी में लड़कों के साथ ट्रेनिंग करनी पड़ती थी। लेकिन यही मजबूरी मेरी सबसे बड़ी ताकत बन गई। लड़कों के साथ खेलने से मेरा खेल तेज हुआ, मैं शारीरिक रूप से मजबूत बनी और मानसिक रूप से भी कठिन चुनौतियों के लिए तैयार हो गई।”

2016: राष्ट्रीय टीम का ऐतिहासिक सफर

जब 2016 में पहली भारतीय महिला राष्ट्रीय आइस हॉकी टीम बनी, तो पद्मा उसकी पहली सदस्य थीं। वह दौर चुनौतियों से भरा था। प्राकृतिक बर्फ पर साल में केवल दो-तीन महीने ट्रेनिंग, उधार के स्केट्स और बिना किसी कोच के टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कदम रखा। पद्मा बताती हैं, “जब हम पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्टिफिशियल आइस पर खेले, तो सब कुछ अलग था। बर्फ बहुत तेज और फिसलन भरी थी, यहाँ तक कि पक (Puck) को कंट्रोल करना भी मुश्किल हो रहा था।” लेकिन टीम ने हार नहीं मानी और 2019 में IIHF विमेंस चैलेंज कप ऑफ एशिया में भारत को पहला ब्रोंज मेडल दिलाया।

2025: यूएई में रचा इतिहास

कोविड-19 के कारण तीन साल तक खेल से दूर रहने के बाद, भारतीय टीम ने मई-जून 2025 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में आयोजित IIHF महिला एशिया कप में वापसी की। यहाँ भारत ने अपना दूसरा एशियाई कांस्य पदक जीतकर दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय बेटियाँ किसी से कम नहीं हैं। पद्मा कहती हैं, “वह मेडल हमारे लिए सिर्फ एक धातु का टुकड़ा नहीं था, वह हमारी सालों की मेहनत और उधार के सामान से शुरू हुए सफर का जवाब था।”

‘खेलो इंडिया’ ने बदली तस्वीर

आज पद्मा केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख की महिला टीम की असिस्टेंट कैप्टन हैं और युवा खिलाड़ियों की मेंटर हैं। वह मानती हैं कि ‘खेलो इंडिया’ ने खेल के पूरे इकोसिस्टम को बदल दिया है।
पद्मा के अनुसार, अब केवल लद्दाख ही नहीं, बल्कि राजस्थान, तेलंगाना और हिमाचल जैसे राज्यों के खिलाड़ी भी आगे आ रहे हैं। नियमित प्रतियोगिताओं से खिलाड़ियों को पहचान और सरकारी नौकरियों के अवसर मिल रहे हैं। लेह, देहरादून और पुणे में आर्टिफिशियल रिंक बनने से ट्रेनिंग अब मौसम की मोहताज नहीं रही।

लक्ष्य: 2027 वर्ल्ड चैंपियनशिप

पद्मा चोरोल का सपना अब और भी बड़ा है। वह कहती हैं, “फिलहाल हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चौथे डिवीजन में हैं। घरेलू लीग और बेहतर सुविधाओं के साथ हमारा लक्ष्य 2027 वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई करना है, और मुझे विश्वास है कि हम यह कर दिखाएंगे।”

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