
आजकल हार्ट ब्लॉकेज की समस्या काफी लोगों में देखने को मिल रही है, और डॉक्टरों के मुताबिक समय रहते जांच कराने से हार्ट अटैक का खतरा काफी कम किया जा सकता है। हार्ट ब्लॉकेज तब होता है जब हृदय तक जाने वाले विद्युत संकेत ठीक से नहीं पहुँच पाते, जिससे दिल की धड़कन धीमी या अनियमित हो जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण धमनियों में कोलेस्ट्रॉल या वसा का जमना होता है।
डॉक्टर बताते हैं कि करीब 68% हार्ट अटैक ब्लॉकेज के कारण ही होते हैं। अगर ब्लॉकेज 30 से 40% तक है तो हर साल हार्ट अटैक का जोखिम लगभग 15% तक बढ़ जाता है। ऐसे में धमनियों की गहरी और सटीक जांच बेहद जरूरी हो जाती है। इसी के लिए आजकल इंट्रावास्कुलर अल्ट्रासाउंड (IVUS) एक बहुत प्रभावी तकनीक मानी जा रही है।
IVUS की खासियत यह है कि यह सिर्फ ब्लॉकेज दिखाती ही नहीं, बल्कि यह भी बताती है कि प्लाक कितना जमा है, वह कठोर है या नरम, और इलाज किस तरह बेहतर होगा। सामान्य एंजियोग्राफी सिर्फ धमनियों की छाया दिखाती है, जबकि IVUS धमनी के भीतर की असली तस्वीर दिखाती है। यही वजह है कि डॉक्टर इसे एंजियोप्लास्टी के दौरान ज्यादा इस्तेमाल करते हैं।
इस प्रक्रिया में एक पतली ट्यूब धमनी के अंदर डाली जाती है, जिसके सिरे पर छोटा अल्ट्रासाउंड सेंसर होता है। यह सेंसर धमनी के भीतर घूमते हुए लाइव इमेज दिखाता है—जिससे डॉक्टर स्टेंट का सही आकार चुन पाते हैं और यह भी जान पाते हैं कि पुराना स्टेंट सही काम कर रहा है या नहीं।
इसके अलावा हार्ट की जांच के लिए एंजियोग्राफी, ECG, ट्रेडमिल टेस्ट और होल्टर मॉनिटरिंग भी उपयोगी टेस्ट हैं। इनसे दिल की धड़कन, ब्लड फ्लो और हृदय की कार्यप्रणाली को अच्छी तरह समझा जा सकता है। खासतौर पर यह जानना जरूरी होता है कि ब्लॉकेज वाला प्लाक स्थिर है या अस्थिर, क्योंकि अस्थिर प्लाक ही अक्सर अचानक हार्ट अटैक का कारण बनते हैं।




