देवभूमि के रहस्य: मां नंदा के भाई ‘लाटू देवता’, जिनकी पूजा से पहले आंखों पर बांधी जाती है पट्टी

लाटू देवता का यह पावन धाम केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और लोक-विश्वासों का एक जीवित दस्तावेज है. भाई-बहन के प्रेम की यह अनूठी गाथा और नागराज के रहस्य से जुड़ी यह परंपरा देवभूमि की दिव्यता को पूरी दुनिया के सामने उजागर करती है.

0
48

चमोली (उत्तराखंड): भारत के कोने-कोने में अनगिनत मंदिर और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं मौजूद हैं, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड की बात ही निराली है. यहां की आबोहवा में ही किसी चमत्कार का अहसास होता है. चमोली जिले के एकांत और सुंदर बाण गांव में स्थित लाटू देवता मंदिर भी एक ऐसा ही रहस्यमयी और चमत्कारी धार्मिक स्थल है, जिसके विधान के आगे बड़े-बड़े तर्क और विज्ञान भी नतमस्तक हो जाते हैं. समुद्र तल से करीब 8,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर के कपाट साल में केवल एक दिन खुलते हैं. खास बात यह है कि इस दौरान मंदिर के मुख्य पुजारी भी भगवान के दर्शन खुली आंखों से नहीं कर सकते. आइए लाटू देवता से जुड़ी इस रहस्यमयी गाथा और अनूठी परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं.

कौन हैं लाटू देवता?

उत्तराखंड की लोक मान्यताओं के अनुसार, लाटू देवता को भगवान शिव के प्रमुख गणों में गिना जाता है और वे माँ नंदा देवी (माता पार्वती का रूप) के धर्म भाई हैं. पौराणिक कथाओं में उन्हें एक वीर सेनापति के रूप में भी स्थान मिला है, जिनके साथ छो सिंह और बमो सिंह नामक दो प्रमुख सहयोगी जुड़े हैं. उत्तराखंड की प्रसिद्ध नंदा राजजात यात्रा में लाटू देवता की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है. यह भव्य यात्रा मां नंदा को उनके मायके से ससुराल (कैलाश) पहुंचाने की एक अनूठी और प्राचीन परंपरा है, जिसमें लाटू देवता मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं.

आंखों और मुंह पर पट्टी बांधकर क्यों होती है पूजा?

इस मंदिर के बारे में सबसे बड़ा रहस्य इसके गर्भगृह से जुड़ा है. ऐसी मान्यता है कि मंदिर के भीतर साक्षात नागराज अपनी अलौकिक मणि के साथ विराजमान हैं. नागराज के विष और उस मणि से निकलने वाला दिव्य व प्रचंड तेज़ इतना खतरनाक होता है कि कोई भी आम इंसान उसे सहन नहीं कर सकता. यही वजह है कि जब साल में केवल एक बार मंदिर के कपाट खुलते हैं, तो मुख्य पुजारी अपनी आंखों, नाक और मुंह पर मोटी पट्टी बांध लेते हैं. वे गर्भगृह से लगभग 80 फीट की दूरी से अथवा पूरी तरह से आंखों को ढंककर ही केवल स्पर्श के माध्यम से पूजा-अर्चना और साफ-सफाई करते हैं. स्थानीय लोगों का यह भी विश्वास है कि मंदिर के भीतर यदि एक दीपक जला दिया जाए, तो सैकड़ों दीप स्वतः प्रज्वलित हो उठते हैं, जिनकी दिव्य चमक सामान्य मनुष्य की आंखें नहीं झेल सकतीं.

क्या है लाटू देवता से जुड़ी पौराणिक कथा?

लोककथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव से विवाह के पश्चात मां नंदा ने एक भाई की इच्छा जताई, तो भगवान भोलेनाथ ने उनका परिचय कन्नौज के राजकुमार लाटू से कराया. मां नंदा ने उन्हें अपना धर्म भाई बनाया और अपने साथ अपने मायके रिसासू ले आईं. एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, जब मां नंदा की डोली बाण गांव पहुंची, तो लाटू देवता को भयंकर प्यास लगी. वे पानी की तलाश में एक स्थानीय महिला की कुटिया में गए. वहां गलती से पानी के मटके की जगह शराब (मदिरा) का मटका रखा था, जिसे उन्होंने अनजाने में पी लिया. अत्यधिक नशे के कारण उनकी सुधि खो गई, वे नीचे गिर पड़े, जिससे उनकी जीभ कट गई और वे गूंगे हो गए. कालांतर में उनका देहांत हो गया. इस घटना से व्यथित होकर मां नंदा ने उन्हें उस क्षेत्र के मुख्य देवता और रक्षक के रूप में पूजे जाने का आशीर्वाद दिया.

मंदिर की वास्तुकला और भौगोलिक स्थिति

जिस स्थान पर लाटू देवता ने शरीर त्याग किया था, वहां स्थानीय बिष्ट समुदाय के लोगों ने एक पवित्र शिवलिंग की स्थापना की. कालांतर में चमत्कारी रूप से एक गाय वहां प्रतिदिन दूध अर्पित करने लगी. एक बार वह लिंग खंडित हो गया, लेकिन एक स्थानीय व्यक्ति को स्वप्न में पुनः स्थापना का आदेश मिला, जिसके बाद बाण गांव में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया. यह मंदिर सुरई के पेड़ों और एक विशाल बरगद के पेड़ की छांव में बेहद शांत वातावरण में स्थित है.

नंदा राजजात यात्रा और कपाट खुलने का दिन

एशिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में शुमार नंदा राजजात यात्रा जो हर 12 साल में आयोजित होती है इसका 12वां पड़ाव यही लाटू देवता मंदिर है. इस पड़ाव के बाद ही लाटू देवता की छतोली आगे की यात्रा का मार्ग तय करती है. इस मंदिर के कपाट साल में केवल वैशाख पूर्णिमा के दिन खोले जाते हैं. इस विशेष अवसर पर विष्णु सहस्त्रनाम, चंडी पाठ और तमाम पारंपरिक अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से संपन्न किए जाते हैं. लाटू देवता का यह पावन धाम केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और लोक-विश्वासों का एक जीवित दस्तावेज है. भाई-बहन के प्रेम की यह अनूठी गाथा और नागराज के रहस्य से जुड़ी यह परंपरा देवभूमि की दिव्यता को पूरी दुनिया के सामने उजागर करती है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here