मोहन भागवत का बड़ा बयान,“आज दुनिया देख रही है कि फ्रांस में क्या हो रहा है। पश्चिम से एक आंधी चली है, भारत में भी इसी तरह के प्रयास रहे हैं।”

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मोहन भागवत का बड़ा बयान,“आज दुनिया देख रही है कि फ्रांस में क्या हो रहा है। पश्चिम से एक आंधी चली है, भारत में भी इसी तरह के प्रयास रहे हैं।”
Source: RSS Official X (Twitter) Handle

मोहन भागवत का बड़ा बयान: ‘हम सबके पूर्वज एक, जब-जब बंटे, तब-तब कमजोर हुए’, “आज दुनिया देख रही है कि फ्रांस में क्या हो रहा है। पश्चिम से एक आंधी चली है, भारत में भी इसी तरह के प्रयास रहे हैं।”

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव और शस्त्र पूजन कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश की एकता, सांस्कृतिक विरासत, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी की जिम्मेदारियों पर विस्तार से अपने विचार रखे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत के सभी लोगों के पूर्वज एक हैं और जब-जब समाज में बंटवारा हुआ है, तब-तब देश कमजोर हुआ है। उन्होंने लोगों से आपसी एकता बनाए रखने, अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने और देश को मजबूत बनाने के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया। संघ के इस विशेष कार्यक्रम में मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया। इससे पहले उन्होंने स्मृति मंदिर पहुंचकर RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। विजयादशमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम संघ की परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दौरान भागवत ने भारत की विविधता, सामाजिक एकजुटता और देश की सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

‘हम सबके पूर्वज एक, बंटने पर कमजोर हुआ समाज’

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने देश की एकता का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में रहने वाले सभी लोगों के पूर्वज एक हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अलग-अलग भाषाओं, जातियों, पंथों, खानपान और रीति-रिवाजों के बावजूद देश की मूल पहचान एक है। भागवत के मुताबिक, भारत को अपनी विविधताओं को स्वीकार करते हुए एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की मजबूती आपसी विश्वास, सामाजिक समरसता और साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है। जब समाज आपसी मतभेदों के कारण बंटता है, तो उसकी सामूहिक शक्ति प्रभावित होती है। इसलिए देश के लोगों को एक-दूसरे के प्रति सम्मान रखते हुए राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश का किया जिक्र

RSS प्रमुख ने अपने भाषण में फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश की परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने पश्चिमी देशों से उठने वाली ऐसी प्रवृत्तियों पर चिंता जताई, जो उनके अनुसार स्थापित व्यवस्थाओं, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं का विरोध करती हैं। मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया में कई जगह व्यवस्था परिवर्तन यानी ‘रिजीम चेंज’ के जरिए परिस्थितियों को बदलने की बात की जाती है, लेकिन केवल सत्ता या शासन व्यवस्था में बदलाव से सभी समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि पहले भी इस तरह के प्रयासों से स्थायी समाधान नहीं निकला और आगे भी केवल व्यवस्था बदलने से समस्याएं समाप्त नहीं होंगी। उनके इस बयान का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि किसी भी देश और समाज की स्थिरता के लिए केवल राजनीतिक बदलाव पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए सामाजिक परिस्थितियों, मूल्यों और लोगों की सोच पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

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RSS के 100 वर्ष: भारतीय पहचान और संस्कृति को मजबूत करने पर जोर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के संदर्भ में मोहन भागवत ने कहा कि संघ पिछले 100 वर्षों से भारत की अपनी पहचान, संस्कृति और परंपराओं के आधार पर समाज को संगठित और मजबूत बनाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने स्वदेशी को महत्वपूर्ण विषय बताते हुए कहा कि देशवासियों को अपनी आवश्यकताओं में स्वदेशी वस्तुओं और संसाधनों को प्राथमिकता देने की दिशा में काम करना चाहिए। उनके अनुसार, अपनी पहचान का बोध और स्वदेशी को अपनाना समाज में आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

भागवत ने संघ के शताब्दी वर्ष में जिन पांच प्रमुख बदलावों पर जोर दिए जाने की बात कही, उनमें अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझना और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना भी शामिल है। उन्होंने इस विचार को देश की सामाजिक और आर्थिक मजबूती से जोड़कर प्रस्तुत किया।

संत रविदास के योगदान को किया याद

विजयादशमी समारोह के दौरान मोहन भागवत ने संत रविदास के जीवन और उनके सामाजिक संदेश का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब देश विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों और अत्याचारों का सामना कर रहा था, उस समय समाज के कई वर्गों में भय का वातावरण था। ऐसी परिस्थितियों में संत रविदास ने स्वधर्म के प्रति निष्ठा, भक्ति और सामाजिक समरसता का संदेश दिया। भागवत के अनुसार, संत रविदास ने अपने आचरण और विचारों के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया तथा कठिन परिस्थितियों में समाज का मनोबल बनाए रखने में योगदान दिया। उन्होंने संत रविदास के संदेश को सामाजिक एकता और आपसी सद्भाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके विचारों के अनुसार, समाज को मजबूत बनाने के लिए लोगों के बीच भेदभाव कम करना और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना आवश्यक है।

राज नारायण बसु और हिंदू मेले का किया उल्लेख

अपने संबोधन में RSS प्रमुख ने बंगाल के राज नारायण बसु का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि राज नारायण बसु के जन्म के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उनके योगदान को याद करना महत्वपूर्ण है। भागवत ने कहा कि राज नारायण बसु ने लोगों को अपनी संस्कृति, परंपराओं और पहचान के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से हिंदू मेले की शुरुआत की थी। स्वदेशी मेलों के माध्यम से समाज को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया गया।

उन्होंने इस उदाहरण के जरिए अपनी परंपराओं को समझने और उन्हें आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके संबोधन में सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक संगठन को देश की मजबूती से जोड़कर देखा गया।

भारत की विविधता ही उसकी विशेषता

मोहन भागवत ने भारत की विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग पंथ, प्रांत, जातियां, भाषाएं, खानपान और रीति-रिवाज मौजूद हैं। यह विविधता भारत की परंपरा और सामाजिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विविधता के साथ-साथ संपूर्ण अस्तित्व की एकता का विचार भी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, अलग-अलग पहचान होने के बावजूद लोगों को यह समझना चाहिए कि वे एक व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा हैं। भागवत ने भारत माता को सर्वोच्च स्थान देने की बात कही और देश को एकजुट होकर आगे बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत पहले भी सामूहिक प्रयासों से आगे बढ़ा है और भविष्य में भी एकता के आधार पर प्रगति कर सकता है।

नशे की बढ़ती समस्या पर जताई चिंता

RSS प्रमुख ने अपने भाषण में नशीले पदार्थों की समस्या का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी में नशीले पदार्थों के सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति चिंता का विषय है।

उन्होंने अभिभावकों और समाज से आग्रह किया कि वे बच्चों और युवाओं को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करें। उनके अनुसार, केवल परिवार ही नहीं, बल्कि समाज के अन्य वर्गों की भी जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को सही दिशा दिखाएं। भागवत ने इस विषय को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ी को सही और गलत के बीच अंतर समझने में सक्षम बनाना जरूरी है। युवाओं को ऐसी आदतों और गतिविधियों से दूर रखने के लिए परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

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नई पीढ़ी को सही और गलत की पहचान सिखाने पर जोर

मोहन भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी नई चीजें सीखने और उन्हें अपनाने के लिए उत्सुक रहती है। हालांकि, उनके मुताबिक युवाओं के लिए यह समझना भी जरूरी है कि कौन-सी चीज उनके और समाज के हित में है तथा कौन-सी नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने नई पीढ़ी में विवेक, जिम्मेदारी और सामाजिक मूल्यों के विकास पर जोर दिया। भागवत के अनुसार, युवाओं को किसी भी विचार या गतिविधि को अपनाने से पहले उसके प्रभावों को समझना चाहिए। उनका कहना था कि समाज को केवल नई पीढ़ी से अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए, बल्कि उसे सही दिशा देने के लिए उचित वातावरण और मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराना चाहिए।

आंदोलनों के उद्देश्य पर भी रखी बात

कार्यक्रम में मोहन भागवत ने आंदोलनों और सामाजिक गतिविधियों के उद्देश्यों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि समाज और देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सभी की है।

उनके अनुसार, यदि किसी आंदोलन के पीछे समाज के प्रति अपनापन और सकारात्मक बदलाव की भावना है, तो उसका उद्देश्य रचनात्मक हो सकता है। लेकिन यदि किसी आंदोलन का इस्तेमाल किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोध बढ़ाने के लिए किया जाता है, तो वह राजनीति का साधन बन सकता है। भागवत ने आगाह किया कि समाज में विरोध और विभाजन बढ़ाने वाली परिस्थितियों का फायदा वे शक्तियां उठा सकती हैं, जो भारत को कमजोर करना चाहती हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन के उद्देश्य और उसके प्रभावों को समझना आवश्यक है।

विजयादशमी पर शस्त्र पूजन और पथ संचलन की परंपरा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजन और पथ संचलन आयोजित करने की परंपरा रही है। इसी परंपरा के तहत नागपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन किया और संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। दशहरे के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में RSS की ओर से पथ संचलन के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। संघ इन गतिविधियों को अपनी संगठनात्मक परंपरा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा मानता है।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन हुई थी। वर्ष 2025 में संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए। शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में संगठन की यात्रा, सामाजिक गतिविधियों और सांस्कृतिक विचारों पर विशेष जोर दिया गया।

नागपुर में आयोजित RSS के विजयादशमी उत्सव में मोहन भागवत के संबोधन का मुख्य केंद्र राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी की जिम्मेदारियां रहीं। उन्होंने भारत की विविधता को स्वीकार करते हुए एकजुट रहने, संत रविदास जैसे महापुरुषों के संदेशों को याद रखने और नशे जैसी सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने की अपील की।

संघ के शताब्दी वर्ष के इस कार्यक्रम में भागवत ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि देश की मजबूती के लिए सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक सहयोग और नागरिकों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हैं।

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