

साखळी (गोवा): गोवा के सुर्ला गांव में दशहरे के अवसर पर श्री मल्लिकार्जुन देवस्थान में मनाया जाने वाला पारंपरिक तरंगोत्सव आस्था, लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में दशहरे के दिन तरंगों की पूजा, घाड़ी समाज के लोगों पर देव-अवसर आना, श्रद्धालुओं को देव-कौल देना और इसके बाद गांव के विभिन्न वाडों में तरंगों का भ्रमण प्रमुख आकर्षण होते हैं।
सुर्ला गांव की पहचान से जुड़ा यह उत्सव आज भी पारंपरिक धार्मिक विधि-विधानों के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ दिन पूरे होने के बाद शुरू होने वाली उत्सव की प्रक्रिया कोजागिरी पूर्णिमा तक चलती है।
वेताल की लोककथा से जुड़ी है परंपरा
स्थानीय लोककथा के अनुसार, दक्षिण गोवा के काणकोण स्थित डोंगरी से श्री मल्लिकार्जुन देव सुर्ला गांव आए थे। उस समय गांव में वेताल के आतंक की मान्यता प्रचलित थी। कहा जाता है कि गांव के अधिपति श्री देव सिद्धेश्वर ने घाड़ी समाज के लोगों से वेताल को काबू में करने का वादा किया था कि इसके बदले गांव का आधा हिस्सा उन्हें दान में दिया जाएगा।
लोककथा के मुताबिक, घाड़ी समाज के लोगों ने एक गड्ढे में केले रखकर चुनौती दी कि जो भी शक्तिशाली हो, वह उन्हें मुंह से उठाकर दिखाए। चुनौती स्वीकार कर वेताल गड्ढे में उतरा, जहां घाड़ी समाज के लोगों ने उसे पकड़ लिया। इसके बाद गांव को उसके आतंक से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
कहा जाता है कि श्री देव सिद्धेश्वर ने अपना वादा निभाते हुए गांव का आधा हिस्सा घाड़ी समाज के लोगों को दिया। इसी के बाद इस स्थान पर श्री मल्लिकार्जुन देव की स्थापना होने की मान्यता प्रचलित है। इस कथा के साथ जुड़ी धार्मिक परंपराएं आज भी गांव की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं।
गोवा के अलग-अलग हिस्सों में श्री मल्लिकार्जुन देव के कई देवस्थान हैं। राज्य में ऐसे लगभग 26 से 27 देवस्थान होने की बात कही जाती है।

दशहरे पर होती है तरंगों की विशेष पूजा
नवरात्रि की नौवीं रात को तरंगों को सजाने की प्रक्रिया शुरू होती है। दशहरे की शाम विधिवत पूजा के साथ धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस दौरान घाड़ी समाज के लोगों पर देव-अवसर आने की परंपरा है और श्रद्धालुओं को देव-कौल दिया जाता है।
इस उत्सव की एक खास विशेषता तरंगों का बिना किसी बाहरी सहारे के खड़ा रहना है। श्रद्धालु इसे दैवीय आस्था से जोड़कर देखते हैं। परंपरा के तहत लोककथा में वर्णित बलि की घटना के प्रतीकात्मक रूप में अवसर आए घाड़ी समाज के व्यक्ति के पेट पर कद्दू रखकर तलवार से काटने की रस्म भी निभाई जाती है। इसके बाद शमी के पेड़ की पत्तियों का आदान-प्रदान कर दशहरा मनाया जाता है।
12 वाडों में भ्रमण करते हैं तरंग
दशहरे के दिन धार्मिक अनुष्ठान पूरे होने के बाद तरंग श्री सिद्धेश्वर देवस्थान में दर्शन के लिए जाते हैं। अगले दिन यहां श्रद्धालुओं को देव-कौल दिया जाता है। इसके बाद तरंग सुर्ला गांव के सभी 12 वाडों में भ्रमण करते हैं और प्रत्येक वाडे में श्रद्धालुओं को देव-कौल दिया जाता है।
करीब तीन दिनों तक गांव के घर-घर जाकर दर्शन देने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद कोजागिरी पूर्णिमा के दिन तरंग वापस श्री मल्लिकार्जुन देवस्थान पहुंचते हैं, जिसके साथ ही उत्सव का समापन होता है।

लोकसंस्कृति और आस्था का प्रतीक है तरंगोत्सव
सुर्ला गांव का पारंपरिक तरंगोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की ऐतिहासिक मान्यताओं, सामुदायिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। पीढ़ियों से ग्रामीण इस परंपरा को सहेजते आ रहे हैं। दशहरे से कोजागिरी पूर्णिमा तक चलने वाला यह उत्सव गोवा की समृद्ध लोकसंस्कृति और स्थानीय धार्मिक परंपराओं की अनूठी झलक प्रस्तुत करता है।



