महागठबंधन की ‘रार’ बन गई सबसे बड़ी हार ! कौन रहा शिकस्त का सूत्रधार ?

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एक बार फिर NDA ने वो कर दिखाया जिसके बारे में किसी ने सोचा भी ना था। बिहार विधानसभा में जनता का ऐसा मन जीता की, चुनाव में जनता ने बंपर जीत या यूं कहें की रिकॉर्ड तोड़ जीत दे डाली… नतीजों ने इस बार कई मायनों में चौंका दिया। 89 सीटें जीतकर बीजेपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, वहीं जेडीयू 85 सीटों पर सिमट गई। लेकिन महागठबंधन के साथ इसका ठीक उलट हुआ। अगर 2010 के बाद सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन रहा तो वो 2025 का रहा, जिसमें महागठबंधन मिलकर भी 50 सीटों का आंकड़ा पार ना कर सका। ये केवल एक चुनावी हार नहीं थी, बल्कि बिहार के राजनीतिक समीकरण में एक बड़े बदलाव का संकेत भी था। दिलचस्प ये रहा कि कई सीटों पर जीत–हार का अंतर बेहद मामूली रहा। जैसे संदेश विधानसभा से जदयू उम्मीदवार रामचरण साह सिर्फ 27 वोटों से जीते, अगिआंव में बीजेपी के महेश पासवान ने वामपंथी उम्मीदवार को 95 वोटों से हराया, बलरामपुर से एलजेपी (रामविलास) की संगीता देवी मात्र 389 वोटों से जीतीं, जबकि ढाका सीट पर आरजेडी के फैसल रहमान 178 वोटों से विजयी रहे। फारबिसगंज में कांग्रेस के मनोज विश्वास की जीत का अंतर सिर्फ 221 वोटों का था। इतने करीबी हार जीत का मुकाबला इस बात की ओर इशारा करता है कि बिहार में मतदाता ने इस बार मुद्दों और उम्मीदवारों को लेकर बेहद बारीकी से फैसला किया था। फिर भी ऐसे में सवाल ये भी है कि महागठबंधन की इतनी करारी हार क्यों हुई ? क्यों वो 50 का आंकड़ा भी पार ना कर पाई ? महागठबंधन की करारी हार के जवाब कई परतों में छुपे हैं। और इसकी शुरुआत गठबंधन की आंतरिक राजनीति से होती है। अंदर ही अंदर शुरू से ही भरोसे की कमी से जुझता दिख रहा था महागठबंधन। पार्टनरों के बीच खींचतान का माहौल बना रहा। कहा तो ये भी जा रहा था की तेजस्वी यादव एकमात्र नेता के रूप में उभरना चाहते थे, लेकिन भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस भला ऐसा कैसे होने देती, वो भी खुद को पीछे रखने को तैयार नहीं थी। वहीं छोटे-छोटे सहयोगी जैसे मुकेश सहनी और वामपंथी दल अधिक हिस्सेदारी मांगते रहे। सीटों के बंटवारे पर घमासान इतना बढ़ा कि हर पार्टी ने अपनी-अपनी अलग चुनावी रणनीति अपनानी शुरू कर दी, जिस कारण कार्यकर्ताओं में एकता खत्म हो गई और वोटों का ट्रांसफर बुरी तरह असफल हो गया। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करना भी महागठबंधन के लिए भारी पड़ा। कांग्रेस के भीतर ये निर्णय स्वीकार्य नहीं था। तेजस्वी पहले से ही जंगलराज और भ्रष्टाचार जैसे पुराने आरोपों के बोझ से दबे हुए थे, और प्रशांत किशोर लगातार नेतृत्व की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे थे। इससे कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग असहज था। नतीजा ये हुआ कि पोस्टरों और मंचों पर RJD की अत्यधिक मौजूदगी ने ये संदेश दिया कि कांग्रेस मजबूरी में इस फैसले को झेल रही है। इसी दौरान मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम घोषित करने की जल्दबाजी ने मुसलमान और महादलित समुदाय के एक हिस्से को नाराज कर दिया, जबकि NDA पहले से इन समूहों को योजनाओं के जरिए अपने करीब ला चुका था। इस चुनाव में गांधी मैजिक भी असरहीन रहा। राहुल गांधी का अभियान न तो तीव्र था, न समयानुकूल। वोटर अधिकार यात्रा और SIR जैसा मुद्दा बिहार के स्थानीय राजनीतिक सन्दर्भ में पकड़ नहीं बना पाया। राहुल के कुछ कार्यक्रमों और बयानों को मतदाताओं ने अप्रासंगिक माना, जबकि युवा उन्हें अभी भी बाहरी नेता की तरह देखते हैं। प्रियंका गांधी भी इस बार माहौल बनाने में नाकाम रहीं। कांग्रेस के अंदर इस बात की भी नाराज़गी रही कि राहुल गांधी की यात्रा और प्रेस कॉन्फ्रेंसों ने कार्यकर्ताओं को गलत दिशा में व्यस्त रखा और असली चुनावी तैयारी पीछे छूटती गई। उधर NDA ने इस पूरी स्थिति का फायदा उठाया। उसकी तरफ से योजनाओं का सीधा लाभ देने वाली राजनीति जैसे लखपति दीदी, कैश ट्रांसफर और महिलाओं पर केंद्रित योजनाएं मतदाताओं के बड़े वर्ग को सीधे प्रभावित करने में सफल रहीं। महागठबंधन जहां आंतरिक झगड़ों और नेतृत्व विवाद में उलझा रहा, वहीं NDA जमीन पर लगातार सक्रिय रहा और लाभार्थियों का मजबूत नेटवर्क तैयार करता रहा । सबसे बड़ा नुकसान सीट शेयरिंग के झगड़े ने कराया। दिल्ली में हुई बैठकों के दौरान कांग्रेस और आरजेडी के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि बातचीत कई बार ठप हो गई। वरिष्ठ नेतृत्व के बीच पुरानी गर्मजोशी भी नदारद थी। कांग्रेस के प्रभारी लगातार सख्त रुख पर कायम रहे और कई सीटों पर पीछे हटने को तैयार नहीं थे। इसका नतीजा ये हुआ कि लगभग दर्जनभर सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस आमने-सामने उतर आए। किसी भी गठबंधन के लिए ये स्थिति एक तरह से आत्मघाती होती है। इससे न सिर्फ चुनाव अभियान कमजोर पड़ा, बल्कि कार्यकर्ता स्तर पर भी एकता पूरी तरह टूट गई। इन तमाम परतों को जोड़कर देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि ये हार सिर्फ विपक्ष की पराजय नहीं, बल्कि रणनीति, नेतृत्व और चुनावी प्रबंधन की विफलता थी। बिहार के मतदाता ने इस बार बहुत सोच समझकर मतदान किया, और इसका फायदा सीधा NDA के खाते में गया, क्योंकि एनडीए ने जहां-जहां भी प्रचार किया वहां स्पष्ट नेतृत्व, संगठित ढांचा और लाभार्थी नीतियों के सहारे भरोसा जीता। लेकिन इसके उलट महागठबंधन अपनी ही उलझनों में, वक्तव्य युद्धों में और अव्यवस्थित तैयारी में फंसकर पीछे छूट गया । अब आने वाले सालों में बिहार की राजनीति की दिशा यही तय करेगी कि क्या महागठबंधन इस टूटे भरोसे और असंगठित ढांचे को फिर खड़ा कर पाएगा या NDA की पकड़ और मजबूत होती चली जाएगी। क्या कांग्रेस अपने साथ सारे महागठबंधन को डूबा देगी, या सभी विपक्षी मिलकर कांग्रेस की नैया को पार लगा देंगे।

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