मौत एक ऐसा सच है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. लेकिन क्या यह जीवन का अंतिम पड़ाव है, या सिर्फ एक पड़ाव मात्र? क्या चेतना शरीर के मिटने के बाद भी जीवित रहती है? ये सवाल सदियों से विज्ञान और आस्था के बीच एक बड़े युद्ध का कारण रहे हैं. हाल के वर्षों में राजस्थान और उत्तर प्रदेश से सामने आईं कुछ घटनाओं ने इस बहस को एक बार फिर हवा दे दी है. 4 साल की बच्ची का अपने पिछले जन्म के बच्चों को पहचान लेना या 10 महीने के बच्चे का विदेशी लहजे में बात करना ये महज संयोग हैं या किसी गहरे सच का संकेत?
4 साल की बच्ची और 30 किमी दूर का ‘अपना’ घर
राजस्थान के राजसमंद जिले के परावल गांव की 4 साल की किंजल चूंडावत की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है. जनवरी 2022 में किंजल ने अचानक दावा किया कि उसका असली घर 30 किलोमीटर दूर पिपलांत्री गांव में है. उसने बताया कि पिछले जन्म में उसका नाम उषा था और उसकी मृत्यु रसोई में आग लगने के कारण हुई थी. जब किंजल को पिपलांत्री ले जाया गया, तो वह गांव की गलियों से ऐसे वाकिफ थी जैसे बरसों वहां रही हो. उसने न केवल उषा के भाई पंकज को पहचाना, बल्कि उषा के चारों बच्चों को देखकर एक मां की तरह भावुक हो गई. सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उसने उन पौधों के बारे में पूछा जिन्हें सालों पहले वहां से हटा दिया गया था.
‘जेनोग्लोसी’ या चेतना का रहस्य?
बीकानेर की नन्हीं क्रुशा का मामला और भी पेचीदा है. जिस परिवार में कोई अंग्रेजी नहीं जानता, वहां 10 महीने की क्रुशा अमेरिकी लहजे में बात करने लगी. उसने खुद को कैलिफोर्निया की एक योग शिक्षिका शीशा बताया और अपनी पुरानी आंटी मरिसा और गुरु अन्ना के नाम तक लिए. वह ऐसे कठिन योग आसन करती है जो उसकी उम्र के बच्चों के लिए असंभव हैं. वैज्ञानिक इसे ‘जेनोग्लोसी’ कहते हैं ऐसी भाषा बोलना जिसे इस जन्म में सीखा ही न गया हो.
शरीर पर मौत के निशान
पुनर्जन्म की कड़ियों में सबसे ठोस प्रमाण बर्थमार्क (जन्मचिह्न) माने जाते हैं. आगरा के टीटू सिंह का दावा है कि वह पिछले जन्म में सुरेश वर्मा थे, जिनकी हत्या गोली मारकर की गई थी. हैरानी तब हुई जब वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के डॉ. इयान स्टीवेन्सन ने सुरेश वर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट निकाली। गोली लगने का स्थान और टीटू के जन्मचिह्न बिल्कुल एक ही जगह पर थे. शोध बताते हैं कि करीब 33% पुनर्जन्म के मामलों में बच्चों के शरीर पर पिछले जन्म की चोटों के निशान मिलते हैं.
विज्ञान बनाम तर्क: क्या कहता है मनोविज्ञान?
जहां डॉ. जिम टकर जैसे शोधकर्ता इसे चेतना का सॉफ्टवेयर ट्रांसफर मानते हैं, वहीं मनोवैज्ञानिकों के अपने तर्क हैं-
सोर्स मॉनिटरिंग एरर: बच्चा टीवी या बड़ों की बातों को अपनी याद मान लेता है.
क्रिप्टोमनेसिया: जानकारी के स्रोत को भूलकर उसे अपना अनुभव समझना.
सांख्यिकीय संयोग: घनी आबादी वाले देश में नाम और घटनाओं का मिल जाना एक इत्तेफाक भी हो सकता है.
अधूरापन या आत्मा का सफर?
क्वांटम फिजिक्स के कुछ सिद्धांत अब यह इशारा कर रहे हैं कि चेतना शायद शरीर के बिना भी अस्तित्व में रह सकती है. आंकड़ों के अनुसार, पुनर्जन्म के 70% मामले अकाल मृत्यु से जुड़े होते हैं. शायद यह जीवन का वह अधूरापन ही है जो स्मृतियों को दोबारा लौटने पर मजबूर करता है. क्या यह आत्मा का अनंत सफर है या इंसानी दिमाग की कोई अनसुलझी गुत्थी? यह सवाल आज भी ‘अगम्य’ बना हुआ है.




