हिमालय का वो अनसुलझा रहस्य: रूपकुंड झील, जहां आज भी तैरते हैं सैकड़ों इंसानी कंकाल

रूपकुंड का असली रहस्य अब सिर्फ यह नहीं है कि वे लोग कौन थे, बल्कि यह है कि 19वीं सदी के वे यूनानी यात्री अपने घर से हजारों मील दूर यहां क्या ढूंढ रहे थे? शायद यह इतिहास का वो पन्ना है जो कभी नहीं लिखा गया. आज रूपकुंड एक चेतावनी है प्रकृति के प्रकोप की भी, और अपनी विरासत को खोने के डर की भी.

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चमोली (उत्तराखंड): कल्पना कीजिए, आप समुद्र तल से 5,029 मीटर (लगभग 16,400 फीट) की ऊंचाई पर हिमालय की गोद में एक खूबसूरत झील के किनारे खड़े हैं. बर्फीली हवाएं चल रही हैं और चारों तरफ सफेद चादर बिछी है. लेकिन जैसे ही गर्मियों की धूप इस बर्फ को पिघलाती है, झील के नीले पानी के नीचे से झांकने लगती हैं सैकड़ों इंसानी खोपड़ियां और हड्डियाँ। कुछ के शरीर पर तो आज भी बाल और मांस के अवशेष मौजूद हैं.

यह किसी हॉरर फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि उत्तराखंड के चमोली जिले की हकीकत है। इसे दुनिया रूपकुंड या कंकाल झील के नाम से जानती है. आखिर ये लोग कौन थे? ये यहां कैसे पहुंचे? और क्या वाकई किसी देवी के श्राप ने यहां एक साथ सैकड़ों लोगों की जान ले ली थी?

1942: जब पहली बार दुनिया के सामने आया खौफनाक मंजर

इस रहस्य की औपचारिक शुरुआत साल 1942 में हुई. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश हुकूमत को डर था कि जापानी सेना गुप्त रास्तों से भारत में घुसने की कोशिश कर रही है. तभी नंदा देवी नेशनल पार्क के रेंजर रूपकुंड झील के पास पहुंचे. वहां का नजारा देखकर उनके रोंगटे खड़े हो गए. झील के चारों तरफ हड्डियां बिखरी हुई थीं. शुरुआत में इसे जापानी सैनिकों का शव समझा गया, लेकिन फोरेंसिक जांच ने खुलासा किया कि ये अवशेष सदियों पुराने हैं.

2019 की रिसर्च: विज्ञान ने पूरी दुनिया को चौंकाया

दशकों तक माना जाता रहा कि ये किसी एक बड़े हादसे या महामारी का शिकार हुए लोग हैं. लेकिन साल 2019 में नेचर कम्युनिकेशंस में छपी एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने सनसनी फैला दी. 38 कंकालों के DNA विश्लेषण से पता चला कि ये सभी लोग एक ही समय में नहीं मरे थे, बल्कि इनके बीच 1,000 साल का अंतर था:

  • ग्रुप A: लगभग 800 ईस्वी के आसपास के भारतीय मूल के लोग.
  • ग्रुप B: सबसे चौंकाने वाला खुलासा! 1800 ईस्वी के आसपास यहां भूमध्यसागरीय (Mediterranean) मूल के लोग पहुंचे थे, जो आज के यूनान (Greece) और क्रीट द्वीप के निवासियों से मेल खाते हैं.
  • ग्रुप C: एक व्यक्ति दक्षिण-पूर्व एशिया से भी था.
  • आज से 200 साल पहले, यूनान (ग्रीस) से लोग इतनी ऊंचाई पर हिमालय की इस निर्जन झील तक क्या करने आए थे? इसका जवाब आज भी किसी के पास नहीं है.

मौत की वजह: कुदरत का ‘गोला’ या देवी का प्रकोप?

वैज्ञानिकों ने जब खोपड़ियों की जांच की, तो उन्हें सिर और कंधों पर गहरी चोट के निशान मिले. ये घाव किसी हथियार के नहीं, बल्कि ऊपर से गिरी किसी गोल चीज़ के थे. विशेषज्ञों का मानना है कि ये लोग एक भयंकर ओलावृष्टि में फंस गए थे. इस खुले इलाके में छिपने की कोई जगह नहीं थी. जब क्रिकेट की गेंद के आकार के ओले गिरे होंगे, तो उनकी चोट से इन लोगों की मौके पर ही मौत हो गई होगी.दिलचस्प बात यह है कि विज्ञान ने जो आज साबित किया, उसे उत्तराखंड के लोकगीत सदियों से गा रहे हैं. स्थानीय कथाओं के अनुसार, कन्नौज के राजा जसधवल अपनी गर्भवती पत्नी रानी बलम्पा और दल-बल के साथ नंदा देवी की तीर्थयात्रा पर निकले थे. राजा ने पवित्र भूमि पर विलासिता का प्रदर्शन किया, जिससे देवी क्रोधित हो गईं. उन्होंने आसमान से लोहे के गोलों की बारिश कर दी. मार्ग में स्थित पाथर नचैणिया नाम की जगह आज भी गवाह है, जहां माना जाता है कि देवी के श्राप से नर्तकियां पत्थर बन गई थीं.

खतरे में ‘लिविंग लेबोरेटरी’

रूपकुंड का रहस्य जितना गहरा है, उतनी ही चिंताजनक इसकी वर्तमान स्थिति है. यह भारत से प्राप्त प्राचीन डीएनए का पहला सबसे बड़ा डेटासेट था, जिसने साबित किया कि हिमालय सदियों से वैश्विक आवाजाही का केंद्र रहा है. लेकिन अब यह विरासत खतरे में है. हर साल यहां पहुंचने वाले हजारों ट्रेकर्स अनजाने में साक्ष्यों को नष्ट कर रहे हैं. कई लोग हड्डियों को यादगार के तौर पर उठा ले जाते हैं, जिससे पुरातात्विक कड़ियां टूट रही हैं.

रूपकुंड का असली रहस्य अब सिर्फ यह नहीं है कि वे लोग कौन थे, बल्कि यह है कि 19वीं सदी के वे यूनानी यात्री अपने घर से हजारों मील दूर यहां क्या ढूंढ रहे थे? शायद यह इतिहास का वो पन्ना है जो कभी नहीं लिखा गया. आज रूपकुंड एक चेतावनी है प्रकृति के प्रकोप की भी, और अपनी विरासत को खोने के डर की भी.

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