शत्रुहंता और ओज की अधिष्ठात्री हैं मां कात्यायनी: जानें भक्तों को कैसे मिलता है मां का आशीर्वाद

द्वापर युग में ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यमुना तट पर मां कात्यायनी की ही पूजा की थी. यही कारण है कि इन्हें ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी पूजा जाता है.

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चैत्र नवरात्र का पावन दिन चल रहा है. भक्त 9 दिनों के लिए अपना तन, मन सब समर्पित कर मां की सेवा में लगे होते हैं. नवरात्रि के 9 दिनों तक मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है.. शारदीय नवरात्रि या चैत्र नवरात्रि के छठे दिन आदिशक्ति के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की उपासना का विधान है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी का यह रूप अमोघ फलदायी माना गया है. महिषासुर मर्दिनी के रूप में विख्यात मां कात्यायनी साहस, शौर्य और विजय का प्रतीक हैं. ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक दृष्टिकोण से देवी का यह स्वरूप भक्तों के भीतर के भय को समाप्त कर उनमें अद्भुत आत्मविश्वास का संचार करता है.

महर्षि कात्यायन की तपस्या का प्रतिफल

देवी का नाम कात्यायनी पड़ने के पीछे एक बेहद रोचक कथा है. प्राचीन काल में कत नाम के प्रसिद्ध महर्षि थे, जिनके पुत्र महर्षि कात्य हुए. इसी गोत्र में महान ऋषि कात्यायन ने जन्म लिया. उन्होंने भगवती पराम्बा की घोर तपस्या की और वरदान मांगा कि स्वयं देवी उनके घर पुत्री के रूप में अवतरित हों. जब महिषासुर का अत्याचार तीनों लोकों में बढ़ गया, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई. महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इनकी पूजा की, जिसके कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा. देवी ने ही अश्विनी कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक कात्यायन ऋषि की पूजा स्वीकार की और दशमी के दिन महिषासुर का वध किया.

स्वर्ण सा कांत और दिव्य स्वरूप

मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और ज्योतिर्मय है. उनका रंग सोने के समान आभायुक्त है. चार भुजाओं वाली देवी सिंह पर सवार हैं. उनके दाहिनी ओर का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में है, जो भक्तों को सुरक्षा का आश्वासन देता है, जबकि नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में है. बाईं ओर के हाथों में वे तलवार और कमल का पुष्प धारण करती हैं. उनका यह रूप सौम्यता और उग्रता का अद्भुत संगम है.

विवाह की बाधाओं को दूर करती हैं देवी

विशेषज्ञों और धर्मशास्त्रियों के अनुसार, मां कात्यायनी की पूजा उन कन्याओं के लिए विशेष फलदायी है जिनके विवाह में विलंब हो रहा है या कोई बाधा आ रही है. द्वापर युग में ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए यमुना तट पर मां कात्यायनी की ही पूजा की थी. यही कारण है कि इन्हें ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में भी पूजा जाता है.

शहद का भोग और लाल रंग का महत्व

नवरात्रि के छठे दिन पूजा में रंगों और भोग का विशेष महत्व होता है. मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इससे साधक के व्यक्तित्व में आकर्षण बढ़ता है और जीवन की कड़वाहट दूर होती है. पूजा के समय लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करना और मां को लाल गुलाब या पीले फूल अर्पित करना फलदायी रहता है.

योग साधना और आज्ञा चक्र

योग मार्ग पर चलने वाले साधकों के लिए छठे दिन का विशेष महत्व है. इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है. योग साधना में आज्ञा चक्र का विशेष स्थान है और मां कात्यायनी की कृपा से साधक को अलौकिक शक्तियों के दर्शन होते हैं. वह इस लोक में रहते हुए भी समस्त सिद्धियों का स्वामी बन जाता है. मां कात्यायनी की भक्ति का मार्ग सुगम और कल्याणकारी है. वे अपने भक्तों के रोग, शोक, संताप और भय को क्षण भर में नष्ट कर देती हैं. इस पावन अवसर पर देवी के चरणों में सच्ची श्रद्धा अर्पित कर कोई भी साधक अपने जीवन को नई दिशा और ऊर्जा दे सकता है.

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