नई दिल्ली: देश की सियासत और निर्वाचन आयोग के गलियारों में इन दिनों ‘फॉर्म 6’ को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है. मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की हालिया टिप्पणी और चुनाव आयोग के रुख ने इस विवाद को और हवा दे दी है. मुख्य रूप से विवाद इस बात पर है कि बिना फॉर्म 6 के मूल ढांचे में बदलाव किए, इसके साथ एक नया घोषणा पत्र (Declaration Form) अनिवार्य क्यों कर दिया गया. इस पूरे विवाद की असलियत, सुप्रीम कोर्ट के कानूनी पहलुओं और इसके चलते मतदाताओं के सामने आई मुश्किलों का पूरा गणित आइए जानते हैं.
क्या है पूरा विवाद और क्यों गरमाई सियासत?
नए मतदाताओं को जोड़ने वाले फॉर्म 6 को लेकर उस वक्त राजनीतिक भूचाल आ गया जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने यह स्पष्ट कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में किसी भी बदलाव की अनुमति नहीं दी थी. सीजेआई के इस बयान के बाद विपक्ष को बड़ा हथियार मिल गया, क्योंकि आयोग ने पहले अपनी सफाई में अदालत की मंजूरी का हवाला दिया था. इस उठापटक के बीच विपक्षी दलों का निर्वाचन भवन की ओर मार्च और अन्य संगठनों के विरोध प्रदर्शनों ने इस मुद्दे को तूल दे दिया है. इस बात की तह तक जाना जरूरी है कि आखिर इस विवाद में कितनी सच्चाई है और क्या सचमुच चुनाव आयोग ने कोई गैर-कानूनी कदम उठाया है?
सीजेआई का बयान और फॉर्म 6 की तकनीकी हकीकत
जब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी व अन्य की याचिका पर सुनवाई हुई, तब CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने यह दलील रखी गई कि फॉर्म 6 में फेरबदल किए गए हैं. इस पर सीजेआई ने स्पष्ट किया कि अदालत ने ऐसा कोई बदलाव मंजूर नहीं किया था. कानूनी और तकनीकी रूप से देखा जाए, तो सीजेआई का बयान बिल्कुल सही है. वास्तविकता यह है कि चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 के मुख्य फॉर्मेट में कोई बदलाव किया ही नहीं है. फॉर्म का ढांचा और उसके नियम ठीक वैसे ही हैं जैसे पहले थे. इसलिए यह कहना पूरी तरह गलत है कि आयोग ने अदालत के निर्देशों के खिलाफ जाकर कोई बदलाव किया है.
सुप्रीम कोर्ट का वो आदेश जिसके बाद जुड़ा घोषणा पत्र
इस पूरे मामले के कानूनी पहलू को समझने के लिए मई 2026 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को देखना होगा, जिसमें आयोग की ‘रेजिड्यूरी अथॉरिटी’ (विशेष शक्तियों) का जिक्र किया गया था. संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को देश में निष्पक्ष चुनाव कराने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. अदालत ने अपने आदेश में माना था कि जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी बड़ी प्रक्रिया चलाई जाती है, तो चुनाव की पवित्रता बनाए रखने के लिए आयोग के पास अतिरिक्त निर्देश लागू करने का अधिकार होता है. इसी अधिकार के तहत आयोग ने फॉर्म 6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा था, जिसे अदालत ने अपनी प्रक्रिया के दायरे में सही माना था.
घोषणा पत्र के पीछे की मंशा और अंदरूनी कलह के कयास
चुनाव आयोग का तर्क था कि इस घोषणा पत्र का मकसद सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में केवल वास्तविक और पात्र नागरिक ही जुड़ सकें. दो दशक बाद हो रहे एसआईआर (SIR) के दौरान फर्जी या दोहरी प्रविष्टियों (Double Entries) को रोकने के लिए आवेदक से उसके माता-पिता और पुरानी मतदाता सूची से जुड़े सामान्य विवरण मांगे गए थे.इस दौरान आयोग के भीतर चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति की खबरें भी आईं, लेकिन आयोग ने साफ कर दिया कि यह निर्णय सभी सदस्यों की सर्वसम्मति से लिया गया था.
सही कौन और गलत कौन?
यदि निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो दोनों पक्षों के अपने तर्क सही हैं. एक तरफ यह सच है कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में किसी बदलाव की मंजूरी नहीं दी थी क्योंकि फॉर्म बदला ही नहीं गया था. दूसरी तरफ, आयोग का यह दावा भी सही है कि एसआईआर के मद्देनजर घोषणा पत्र मांगने की उसकी शक्ति को अदालत ने उचित ठहराया था.
सबसे बड़ा पेंच: क्या मतदाता हुए वंचित?
तमाम कानूनी दांव-पेचों के बीच सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म ECInet और फॉर्म 6 के साथ इस घोषणा पत्र को अनिवार्य बनाना एक प्रशासनिक गलती साबित हुआ? जमीनी रिपोर्ट्स और आंकड़ों से संकेत मिलते हैं कि इस घोषणा पत्र की औपचारिकताओं और जटिलताओं को पूरा न कर पाने के कारण कई ग्रामीण और आम लोग नए मतदाता बनने से चूक गए. कागजों पर भले ही यह सूची को शुद्ध करने का प्रयास रहा हो, लेकिन इसकी अनिवार्यता ने कई वैध नागरिकों के मताधिकार पर संकट जरूर खड़ा कर दिया है.




