सौरभ दास और आशुतोष रांका को हाईकोर्ट की फटकार, अभिजीत दीपके ने अपनों से ही किया किनारा। आखिर क्या है पूरा माजरा?

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प्रदर्शन की तैयारी…पुलिस की कार्रवाई… हिरासत और फिर कोर्ट में कानूनी लड़ाई…कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP की मुश्किलें लगातार बढ़ती नजर आ रही हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में अब एक नया मोड़ आ गया है। अभिजीत दीपके के सामने आए वीडियो ने संगठन की रणनीति और प्रदर्शन की मंशा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर दीपके अपने ही साथियों के बनाए प्लान से किनारा क्यों कर रहे हैं? क्या ये दबाव में लिया गया फैसला है या फिर खुद को कानूनी मुश्किलों से बचाने की कोशिश और सबसे बड़ा सवाल- जिस आंदोलन को ‘जेन-जी’ की आवाज बताया जा रहा था, क्या वह वाकई किसी बड़े बदलाव की लड़ाई थी या उसकी रणनीति और मकसद को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं।

दरअसल, इस पूरे मामले ने तब तूल पकड़ा, जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया। इसके बावजूद, 13 अक्टूबर को सौरभ दास और आशुतोष रांका तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे। इसके बाद दोनों को हिरासत में ले लिया गया। 14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। 19 अक्टूबर को हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद उनकी कस्टडी दो दिन के लिए और बढ़ा दी गई। इस फैसले को दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने न सिर्फ याचिकाकर्ताओं के आचरण, बल्कि संगठन की भूमिका और प्रदर्शन के उद्देश्य पर भी सवाल उठाए। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं ने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया और बैरिकेड तोड़ा। दोनों की उम्र 27 और 31 साल बताए जाने पर अदालत ने टिप्पणी की कि वे जेन-जी नहीं हैं। अदालत ने संगठन के उद्देश्य और याचिकाकर्ताओं के उससे संबंध को लेकर भी सवाल किए। साथ ही, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की मंशा पर भी सवाल उठाए गए। इसके बाद सौरभ दास और आशुतोष रांका ने न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने के खिलाफ दायर अपनी याचिका वापस ले ली। यानी, जिस प्रदर्शन को लेकर संगठन अपनी बात रख रहा था, उसी प्रदर्शन की रणनीति और उसके पीछे की मंशा अब बहस के केंद्र में आ गई है।

अब सवाल सिर्फ हिरासत और कानूनी कार्रवाई का नहीं है। सवाल है कॉकरोच जनता पार्टी के मकसद का, शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग करना, छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दे उठाना और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करना ये अपने आप में अलग मुद्दे हैं, लेकिन जब SIR के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों के बीच CJP की एंट्री होती है और इस पूरे घटनाक्रम को जेन-जी आंदोलन के तौर पर पेश किया जाता है, तो संगठन की भूमिका और उसकी रणनीति पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या यह वास्तव में युवाओं की आवाज को बुलंद करने की कोशिश थी या फिर इस आंदोलन के राजनीतिक मायनों को लेकर भी सवाल किए जाने चाहिए। हालांकि, किसी संगठन की मंशा पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले उसके बयानों, गतिविधियों और तथ्यों को समझना जरूरी है और अब इस पूरे विवाद में अभिजीत दीपके का वीडियो एक नया मोड़ लेकर आया है। दीपके के बयान के मुताबिक, वह अपने साथियों की बनाई योजना के हिसाब से काम कर रहे थे, अगर उनके बयान को इसी संदर्भ में देखा जाए, तो सवाल उठता है कि क्या संगठन के भीतर रणनीति को लेकर मतभेद हैं। क्या दीपके अपने साथियों की भूमिका सामने रख रहे हैं, या फिर खुद को इस पूरे घटनाक्रम से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन इतना जरूर है कि हिरासत…अदालत की टिप्पणियों और अब सामने आए इस बयान ने CJP की रणनीति पर नई बहस छेड़ दी है। आंदोलन का दावा बड़ा था। मकसद युवाओं की आवाज बनने का था, लेकिन अब सवाल आंदोलन के तरीके, उसकी रणनीति और संगठन की जवाबदेही पर हैं। क्या यह युवाओं के मुद्दों की लड़ाई थी, या फिर रणनीति को लेकर संगठन के भीतर ही सब कुछ एक जैसा नहीं था। जवाब जानना इसलिए जरूरी है…क्योंकि लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार जितना अहम है…उतनी ही अहम है उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही।

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