नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Form-6 में किए गए बदलाव को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में किए गए किसी भी संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अब अदालत रिकॉर्ड के जरिए यह जानना चाहती है कि Form-6 में बदलाव का फैसला आखिर किस स्तर पर लिया गया। कोर्ट ने चुनाव आयोग से संबंधित फैसलों और उनकी प्रक्रिया का पूरा रिकॉर्ड पेश करने को कहा है।
Form-6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ने पर विवाद
SIR की प्रक्रिया के दौरान Form-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र यानी डिक्लेरेशन जोड़े जाने को लेकर विवाद सामने आया है। बताया गया है कि नए मतदाताओं से पुरानी मतदाता सूची से संबंधित जानकारी देने के लिए अतिरिक्त विवरण मांगा गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से इसे Form-6 में बदलाव के तौर पर पेश किया गया, जबकि चुनाव आयोग की ओर से इसे अतिरिक्त Annexure बताया गया है। यही अंतर अब अदालत की जांच के दायरे में है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के सामने Form-6 में जोड़ी गई अतिरिक्त शर्तों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि दिल्ली में SIR के दौरान इस तरह के बदलाव किए गए और बड़ी संख्या में मतदाता इससे प्रभावित हुए हैं।
इस पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी बदले हुए Form-6 को मंजूरी नहीं दी है।
कोर्ट ने पूछा- बदलाव का फैसला किसने लिया?
अदालत ने कहा कि जब संबंधित रिकॉर्ड सामने आएगा, तब वह यह देखेगी कि Form-6 में बदलाव का निर्णय किसने लिया था। साथ ही यह भी जांच की जाएगी कि क्या निर्णय केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ओर से लिया गया था या फिर चुनाव आयोग के सभी सदस्यों ने इसे सर्वसम्मति अथवा बहुमत से मंजूरी दी थी।
CJI ने संकेत दिया कि यदि आयोग के भीतर किसी फैसले पर आम सहमति नहीं बनी थी, तो निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक बहुमत से फैसला लिया जाना चाहिए था। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अदालत उस फैसले की वैधता पर विचार कर सकती है।
‘गैरकानूनी काम हुआ तो नतीजे भी भुगतने होंगे’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड की जांच में किसी तरह की गैरकानूनी प्रक्रिया सामने आती है तो उसके परिणाम होंगे।
अदालत ने कहा कि ECI का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड देखने के बाद अगर यह सामने आता है कि कुछ फैसले जरूरी प्रक्रिया या आम सहमति के बिना लिए गए थे, तो उन फैसलों को वापस लेने या रद्द करने पर विचार किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर कोई आदेश जारी नहीं कर सकती। उसे चुनाव आयोग का आधिकारिक जवाब और रिकॉर्ड देखना होगा।
CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर भी राहत नहीं
इस मामले में याचिकाकर्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग भी की थी। आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग में कुछ फैसले और बदलाव अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किए गए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल CEC को निलंबित करने के लिए कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है। अदालत पहले यह देखना चाहती है कि विवादित फैसले किस तरीके से लिए गए और क्या उनमें चुनाव आयोग की निर्धारित निर्णय प्रक्रिया का पालन हुआ था।

दिल्ली और बंगाल में SIR को लेकर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि SIR की प्रक्रिया का असर बड़ी संख्या में मतदाताओं पर पड़ा है। दलील में दिल्ली में करीब 30 लाख और पश्चिम बंगाल में करीब 90 लाख मतदाताओं के प्रभावित होने का दावा किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने इसे मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया और कहा कि मामला केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग के राष्ट्रीय स्तर पर काम करने के तरीके से जुड़ा है।
अब सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्रवाई काफी हद तक चुनाव आयोग की ओर से पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड और जवाब पर निर्भर करेगी। अदालत यह तय करेगी कि Form-6 में किए गए बदलाव और SIR से जुड़े अन्य फैसले निर्धारित संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए गए थे या नहीं।




